अतिक्रमण हटाने का खेल तमाशा आखिर कब तक?

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देहरादून । हाईकोर्ट के निर्देश पर राजधानी दून में पिछले 13 दिनों से जो अतिक्रमण के खिलाफ कार्यवाही चल रही है उसने दून की शक्ल सूरत को ही विगाड़ कर रख दिया है। टूटे फूटे घर मकान दुकान और सड़कों पर बिखरा मलबा और इसके बीच अब इस अभियान के विरोध ने यह सवाल खड़ा कर दिया है क्या हो साल दो साल के अंतराल पर की जाने वाली यह कार्यवाही उचित है? शासन-प्रशासन द्वारा आज तक ऐसी कोई कार्ययोजना क्यों तैयार नहीं की गयी जो एक बार में ही अतिक्रमण से मुक्ति दिला पाती और नये अतिक्रमणों पर रोक लगा पाती।
राज्य गठन के बाद शासन प्रशासन द्वारा अगर राजधानी दून के विकास के लिए कोई मास्टर प्लान तैयार किया होता तो हर बार होने वाले इस विनाश और नुकसान तथा विरोध से बचा जा सकता था लेकिन एमडी जैसी संस्थाएं आंख पर पट्टी बांधे बैठी रही जिन्होंने अवैध निर्माणों को अपनी अवैध कमाई का जरिया बना लिया और सत्ताधारी दल वोटों के लिए दून के नदी नालों, तालों तथा सरकारी जमीनों पर अवैध बस्तियां बसाने में मशगूल रहे जो अब सरदर्दी भी बड़ा कारण बनी हुई है और इन्हें हटाना अब शासन प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस अभियान को चलाने में सरकार को करोड़ों खर्च करना पडे़गा वहीं अरबों रूपये की सम्पत्ति का जो नुकसान होगा वह अलग।
जब देश आजाद हुआ था देश की आबादी 60 करोड़ थी जो अब 130 करोड के आसपास है। वही दून की आबादी जो 50 हजार से भी कम थी अब सवा सात लाख से ऊपर जा चुकी है। स्थितियाें में आये बदलाव के साथ जरूरतें और संसाधनों में भी बदलाव जरूरी था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। एक समय में राजधानी दून के हर क्षेत्र चाहे वह आढ़त बाजार हो, या चकराता रोड, या दिलाराम बाजार व पल्टन बाजार अथवा एस्लेहाल व करनपुर हर जगह लोगों ने नीचे दुकानें व ऊपर मकान बना रखे थे। लेकिन समय के साथ अपर ऊपर के आवासीय भवन भी कामर्शियल यूज के लाये जाने लगें अब अगर इनके लैण्ड यूज के हिसाब से अतिक्रमण हटाया गया तो पूरा शहर ही मलबे के ढेर में तब्दील हो जायेगा। गलती शासन-प्रशासन के स्तर पर की गयी लेकिन अब इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। विरोध भी इसी को लेकर हो रहा है।
2005 में चकराता रोड व पल्टन बाजार में चलाये गये अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत पूरा अतिक्रमण क्यों नहीं हटाया गया। क्यों अब दोबारा यहां अतिक्रमण हटाने की जरूरत पड़ रही है? पल्टर बाजार में मेहंदी लगाने से लेकर रेहड़ी ठेली वालों तक ने अपने ढोर बना रखे है। सारा खेल पल्टन बाजार से शुरू होता है जिसका जिक्र अतिक्रमण में सबसे पहले आता है। इसके भी कोई दो राय नहीं कि अतिक्रमण ने दून की सूरत बिगाड़ रखी है लेकिन क्या अतिक्रमण हटाने के नाम पर आये साल चलने वाला यह ड्रामा उचित है यह सबसे अहम सवाल है? दूसरा अहम सवाल है इसके स्थायी समाधान का जिस पर एमडीडीए नगर निगम या सरकार द्वारा कभी कोई ठोस पहल क्यों नहीं की गयी? जिस तरह यह खेल तमाशा सालों से चल रहा है उससे तो दून की तमाम बिजनिस एक्टिविटी शून्य हो जायेगी। ऐसी स्थिति में यहां सिर्फ चोर उचक्कों का ही साम्राज्य विकसित होगा।

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