नहीं रही उत्तराखण्ड की तीजन बाई

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देहरादून। मशहूर लोक गायिका कबूतरी देवी का आज पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल में निधन हो गया। राष्ट्रपति पुरस्कार सेे सम्मानित 74 वर्षीय कबूतरी देवी को उत्तराखण्ड की तीजनबाई भी कहा जाता था। उनके निधन से कला जगत में शोक की लहर है।
लोक गायिका पिछले कई दिनों से सांस लेने में हो रही दिक्कत के कारण पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में भर्ती थी। जिनकी बिगड़ती हालत को देखते हुए डाक्टरों ने उन्हें हायर सेंटर रेफर कर दिया था। लेकिन हेलीकाप्टर की सुविधाा न मिलने के कारण उन्हें हायर सेंटर नहीं ले जाया जा सका। उनके परिजनों ने उनके निधन के बाद इस बात को लेकर अस्पताल में हंगामा भी किया। 60 और 70 के दशक में जब महिला का घर से बाहर निकलना भी वर्जित था। उस दौर में कबूतरी देवी ने आकाशवाणी से उत्तराखण्ड के लोक गीतों को देश और दुनिया तक पहुंचाए। पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गांव की कबूतरी देवी किसी स्कूल कालेज में नहीं पढ़ी थी ओर न ही उन्होंने कहीं से संगीत की तालीम ली थी। बल्कि पहाड़ी गांव के कठोर जीवन के बीच अपनी आवाज और कला से देश और दुुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
14 साल की उम्र में चंपावत जिले से पिथौरागढ़ जिले में ब्याह कर आई कबूतरी देवी को ससुराल आकर अपनी गायिकी को आजमाने का मौका मिला, पति दीवानी राम उन्हें आकाश वाणी केन्द्रों तक ले गए। संगीत की औपचारिक तालीम न लेने पर भी उनका अनुभव सुर व ताल को अपनी उंगली पर नचाना है वह गाने के साथ खुद हारमोनियम बजाती थीं, तो साथी तबला वादक को सही निर्देश भी देतीं थी। दरअसल कबूतरी देवी का संबंध पहाड़ की उस परंपरागत गायिकी से रहा है। जिसे यहां की मूल कला भी कहा जाता है। उन्होंने 100 से अधिक लोक गीत आकाशवाणी पर गाये। उनकी कला के लिए राष्ट्रपति द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया। यही उनके जीवन का सबसे बड़ा संतोष है। कबूतरी देवी का जीवन संघर्ष या समझने में मदद करता है कि वास्तविक कला क्या होती है।
भात पकायो बासमती को भूख लागी खै कबूतरी देवी की कही इन पक्तियों से हम उनके व्यक्तित्व का अंदाज लगा सकते हैं। कि बिना किसी से कोई उम्मीद व अपेक्षा किए कैसे उन्होंने अपना जीवन सादे तरीके से जिया।

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