खुद पर भारी पड़ा सीएम का गुस्सा

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देहरादून। जनता दरबार की उत्तरा गाथा में भले उत्तरा की मांग को अनुचित ठहराया जाए या फिर उनके व्यवहार को लेकिन यह सब बातें अब कोई मायने नहीं रखती हैं। यह पूरा मामला अब मुख्यमंत्री के आपा खो देने और एक वयोवृद्ध महिला शिक्षिका के साथ असंवेदन शील व्यवहार करने पर आकर टिक गया है। भले ही भाजपा नेता उनके समर्थन में खडे़ हो या शिक्षा विभाग के अधिकारी अब मामले की लीपापोती में लगे हों लेकिन अपने अनुचित व्यवहार के कारण मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की छवि व पार्टी को बड़ा झटका लगा। जिसने भी इस घटना का बीडियो देखा है वह उन्हें गलत ठहरा रहा है।
दरअसल यह सवाल त्रिवेन्द्र सिंह के व्यवहार और आचरण का नहीं है बल्कि एक सूबे के मुख्यमंत्री के आचरण है। गुस्से में तमतमाएं मुख्यमंत्री ने जिस तरह मंच से इसे बाहर ले जाओ बाहर निकालों, गिरफ्रतार कर लो ओर इसी वक्त सस्पेड कर दो जैसी बातें करते समय यह सोचा ही नहीं कि वह मुख्यमंत्री हैं जिसकी अपनी एक खास गरिमा होती है और उन्हें हर हाल में शालीन बने रहना जरूरी है। वह तो अपनी समस्या ओं से पीडि़त शिक्षिका से भी पहले अपनी आपा खो बैठे। उससे भी बड़ी बात यह है कि गुस्से में उन्होंने जो कहा उसे करके भी दिखा दिया। शिक्षिका उत्तरा को जिस आधार पर निलम्बित किया गया है। वह कानून की किसी डिक्सनरी में सही आधार भी नहीं है शिक्षा विभाग अब उत्तरा के पूरे सेवा काल का लेखा जोखा मीडिया में पेश करके उन्हें गलत साबित करने पर आमादा है और जांच के नाम पर एक ओर नाटक किया जा रहा है। गलत को सही साबित करने के चक्कर में शिक्षा विभाग के अधिकारियों व सरकार की और अधिक किरकिरी हो रही है। 55 वर्षीय शिक्षिका जिनके पति का तीन साल पहले मृत्यु हो चुकी है अगर अपने तबादले व न्याय की मांग मुख्यमंत्री से कर रही थी अगर मुख्यमंत्री को अनुचित लग रहा था तो वह उन्हें सीधे यह कह सकते थे यह नियम विरूद्ध और असंभव है। इसलिए उनकी भी मजबूरी है कि वह ऐसा नहीं कर पायेंगे। शायद यह मामला आगे नहीं बढ़ता ओर वही खत्म भी हो जाता।

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