सालों में नहीं हटा तो चार सप्ताह में कैसे हटेगा दून से अतिक्रमण

0
145

देहरादून। दो दिन पूर्व नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा देहरादून के मनमोहन लखेड़ा की याचिका पर दिए गए निर्देश जिसमें चार सप्ताह में राजधानी का अतिक्रमण हटाने को कहा गया है। अब शासन प्रशासन के लिए गले की हड्डी बन चुके हैं। अधिकारियों के यह समझ नहीं आ रहा है कि वह अदालत के आदेशों का अनुपालन किस तरह सुनिश्चित करें। जो काम पिछले 18 सालों में संभव नहीं हुआ उसे चार सप्ताह में कैसे किया जा सकता है?
अदालत द्वारा राजधानी देहरादून के अतिक्रमण पर जिस तरह की तल्ख टिप्पणी की गई है और शासन को साफ-साफ शब्दों में यह कहा गया है कि वह चाहे जो करे चार सप्ताह में देहरादून का अतिक्रमण हटाया जाए। खासबात यह है कि इन आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित न होने पर मुख्य सचिव को जिम्मेदार माने जाने की बात भी अदालत में कही है।
राजधानी दून का कोई भी एक बाजार ऐसा नहीं है कि जहां अतिक्रमण न हो अगर बात सिर्फ पल्टन बाजार की करें तो इस बाजार से अतिक्रमण हटाने के लिए अदालत द्वारा अब तक कई बार सख्त आदेश जारी किए जा चुके हैं। हाई कोर्ट के आदेश पर वर्ष 2004 में अतिक्रमण हटाया गया था। दुकानों के आगे बनी नालियों को तोड़ा गया था और उनक पुनर्निर्माण भी कराया गया था। इन नालियों को पाटकर फुटपाथ बनाये गए थे। लेकिन आज यह सारे फुटपाथ अतिक्रमण के जरिए दुकानदारों के कब्जे में हैं। इन पर सभी दुकानदार अपने सामान का डिस्प्ले किए बैठे हैं। यही नहीं सड़क पर दोनों तरफ टूव्हीलर पार्किंग बनायी हुई हैं तथा दुकानों के सामने रेड़ी डेली और स्टंग लगाकर सामान बेचने वालों को ठेके दिए हुए हैं। जिसके कारण आधी सड़क को आने जाने वाले लोग इस्तेमाल कर पा रहे हैं।
पल्टन बाजार में सण्डे बाजार को अब तक शासन-प्रशासन द्वारा कई बार हटवाया जा चुका है लेकिन स्थिति यह है कि दो चार सप्ताह में फिर पुरानी स्थिति बहाल हो जाती है जब भी बाजारों में अतिक्रमण को लेकर अदालत का कोई सख्त आदेश आता है तो व्यापारी और व्यापारी संगठन एक स्वर से अतिक्रमण हटाने के पक्षधर बन जाते हैं। और वह अतिक्रमण को हटाने की पैरोकारी करने लगते हैं लेकिन जब नगर निगम और प्रशासन की टीम अतिक्रमण हटाने के लिए जाती हैं तो यही व्यापारी और उनके नेता उसके विरोध में खडे हो जाते हैं। नतीजा हमेशा ढांक के तीन पांत ही रहता है।
अतिक्रमण हटाने के लिए चलाये जाने वाले तमाम अभियान हमेशा ही नाकाम इसलिए हो जाते हैं क्योंकि अतिक्रमण हटाने के कुछ ही समय में इन दुकानदारों द्वारा फिर अतिकमण कर लिया जाता है। क्योंकि उन्हें यह पता होता है कि एक बार अतिक्रमण हटाने के बाद कोई अधिकारी व कर्मचारी मौके पर यह देखने के लिए नहीं आता है कि अब स्थिति क्या है। राजधानी के सम्पूर्ण अतिक्रंमण को हटाना तो बहुुत दूर की बात है उत्तराखण्ड का शासन और प्रशासन मिलकर चार सप्ताह में चार बाजारों का भी अतिक्रमण नहीं हटा सकता है।

LEAVE A REPLY