अतिक्रमण पर सख्ती जरूरी

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प्रशासन द्वारा बार-बार हटाये जाने के बावजूद भी अतिक्रमण की समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाता? इसका सबसे प्रमुख कारण प्रशासन की लापरवाही ही है। अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ है जब घंटाघर से आईएसबीटी तक अतिक्रमण हटाने के लिए महा अभियान चलाया गया था। लेकिन इसमें जो अवैध् निर्माण तोड़े गये थे वहां फिर से कच्चे पक्के निर्माण तेजी से किये जाने लगे। रातों-रात दुकाने बन गयी।

सवाल यह है कि शासन प्रशासन की सख्ती के बाद भी अक्रिमणकारियों को कोई भय नहीं है। बीते कल लालपुल, मातावाला बाग व भूसा स्टोर सहित कई जगह शासन को पुनः किये गये इस अतिक्रमण पर बुलडोजर चलवाना पड़ा। दरअसल प्रशासन का अब तक यही रवैया रहा है कि वह अतिक्रमण हटाता है और अतिक्रमण करता भी है। अतिक्रमण कारी भी जानते है कि रोज-रोज प्रशासन उन्हे हटाने नहीं आयेगा। यही कारण है कि वह दोबारा फिर अपनी दुकानें सजा कर बैठ जाते है। ऐसा नहीं है कि प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं होती, लेकिन वह इसे अपनी अवैध् कमाई का जरिया बना लेता है। यही कारण है कि सौ बार कार्यवाही के बाद भी अतिक्रमण की यथास्थिति बनी रहती है।

जब शासन के सख्त आदेश है कि अगर दोबारा कोई अतिक्रमण करे तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाये तो फिर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है? प्रशासन दोबारा किये गये अतिक्रमण को तोड़कर उन्हे फिर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया है अगर प्रशासन की सोच है कि उनकी चेतावनी से ही यह अतिक्रमण कारी सुधर जायेंगे और फिर अतिक्रमण नहीं करेेंगे तो यह संभव नहीं है क्योंकि उन्हे इसकी आदत पड़ चुकी है.

जब तक प्रशासन द्वारा इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही नहीं की जायेगी तब तक यह सुधरने वाले नहीं है कम से कम यह अच्छा है कि इस बार प्रशासन ने दोबारा अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कुछ कार्यवाही तो की। अन्यथा एक बार कार्यवाही करने के बाद फिर वह मुड़कर भी नहीं देखते कि पीछे क्या हो रहा है।

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