शराब ठेकों पर भिड़ंत

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राजधानी दून सहित पूरे प्रदेश में शराब ठेकों को लेकर प्रशासन और जनता के बीच भिड़ंत जारी है। भले ही सूबे की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इस विरोध के कारण सूबे में शरबा को हतोत्साहित करने की बात करते रहे हों लेकिन यह जनता को धोखा देने वाली बात ही है न तो सरकार शराब से होने वाली आय का मोह छोड़ने को तैयार है और बिना शराब के सूबे का पर्यटन उद्योग आगे बढ़ सकता है। विरोध की इस समस्याका अहम् कारण सरकार की दोहरी नीतियां ही हैं।

सरकार सीधे तौर पर जनता को यह क्यों नहीं कहती है कि शराब पर किसी तरह की भी पाबंदी नहीं लगाई जासकती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईवे से ठेकों को हटाये जाने के आदेशों के बाद शराब की दुकानों को स्थानान्तरित करने में सरकार व आबकारी विभाग क पसीने छूट गये। कठोर मानकों के कारण इन दुकानों के लिए नई जगह तलाश पाना आसान काम नहीं है। हाईवे से हटाकर इन दुकानों को आवासीय क्षेत्रों में खोले जाने का विरोध न सिर्फ स्वाभाविक है अपितु उचित भी है।

जहां भी शराब का ठेका होगा वह तमाम तरह के आसामाजिक तत्वों का जमावडा तय हैं किसी भी बस्ती के लोग नहीं चाहेंगे कि उस जगह का माहौल खराब हो। जहां वह और उनका परिवार रहता है। यह विडम्बना ही है कि ठेकों के विरोध में स्थानीय लोग महीनों से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं और शासन-प्रशासन उनकी जायज मांगों को भी मानने को तैयार नहीं है।

तथा लाठी के दम पर इन ठेकों को खुलवाने पर आमादा है। कल रायपुर में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। सवाल यह है कि जनहित के मामलों पर क्या शासन-प्रशासन का यह रवैया उचित है? निश्चित तौर पर सरकार को अपनी इस कार्यशैली पर गौर करना चाहएि क्योंकि जनता ने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया है।

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