नेताओं ने खुद क्यों किया पलायन?

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पहाड़ से पलायन पर आयोग, समस्या से मुंह चुराना

हमारे संवाददाता
देहरादून। राज्य गठन के 16 सालों के विभिन्न मामलों में दर्जनों आयोग गठित कर चुकी उत्तराखण्ड की सरकारों की परम्परा को जारी रखते हुए सूबे की त्रिवेन्द्र सरकार ने पलायन रोकने के लिए एक और आयोग बनाने की जो घोषणा की है वह अत्यन्त ही विस्मय कारी है। हैरान करने वाली बात यह है कि घोटालों की जांच के लिए आयोग बने लेकिन इन आयोगों से न तो कोई जांच मुकाम तक पहुंची न ही अभी तक राजधानी बनी तो फिर यह नया आयोग सूबे के पलायन को कैसे रोकेगा?

असल बात यह है कि सूबे के नेता चाहते ही नहीं कि किसी समस्या का समाधान हो? न उनके पास किसी समस्या के समाधान के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति है। त्रिवेन्द्र रावत क्या खुद यह नहीं जानते कि पलायन के अहम कारण क्या है? या फिर अपने आप को गाड गधेरों का नेता बताने वाले पूर्व सीएम हरीश रावत को यह पता नहीं था कि लोग पहाड़ों को छोड़कर क्यों भाग रहे है? सूबे के नेता कोई विलायत से नहीं आये है। उन्हे हर स्थिति परिस्थति का बखूबी ज्ञान है और उन्हे समाधान भी पता है लेकिन वह आयोग की आड़ में समस्याओं को टालने में महारथ रखते है।

सूबे के इन नेताओं को इस बात पर गौर करने की जरूरत है वह खुद क्यों पहाड़ छोड़कर मैदान में आकर बस गये है। क्यों उन्होने दून और अन्य मैदानी क्षेत्रों में अपने आसियाने बना लिये है। क्यों हमेशा उनकी तलाश रहती है कि वह पहाड़ी क्षेत्रों की अपनी पैत्रिक व पराम्परागत सीटों को छोड़कर मैदानी क्षेत्र की सीट से चुनाव लड़े। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत क्यों डाईवाला सीट से चुनाव लड़े। जब नेता खुद पहाड़ों से भाग रहे है तो वह भला क्या पलायन को रोकेंगे।

16 साल और 32 लाख लोगों का महज नौ जिलों से पलायन मायने रखता है। इन जिलों में एक हजार से अधिक गांव पूरी तरह यूं ही नहीं उजड़ गये सरकार को आयोग क्या बतायेगा? क्या मुख्यमंत्री खुद नहीं जानते कि जहाँ रोजगार न हो, शिक्षा और स्वास्थ्य की कोई सुविधा न हो, जहाँ सड़क बिजली पानी न हो वहां जीवन की दुश्वारियों को कोई कितने समय ढो सकता हैं।

अपना घर बार खेती खलिहान छोड़ने व पलायन का दर्द क्या होता है? इसे एक भुक्त भोगी ही जान सकता है सूबे से होने वाला पलायन शौक नहीं लोगों की मजबूरी है। 16 सालों में सूबे की सरकारों ने अगर इसे गम्भीरता से लिया होता तो शायद सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत को भी इसे रोकने के लिए आयोग बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।

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