सरकारी कार की रंगत हजार

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सुनील जैन ‘राही’
घर के बाहर खड़ी कार आपका सम्मान बढ़ाती है। पुरानी हो या नयी सम्मान का प्रतीक है। सरकारी कार हो तो सम्मान और बढ़ जाता है। सरकार में रहना और कार में बैठना सुकून की बात है। लोग बाहर से झांक कर देखते हैं, कौन कार में है, कौन सरकार में है।

सरकारी खड़ी कार भी चलती है और सरकार भी चलती है। खड़ी कार और खड़ी सरकार दोनों ही निकम्मेपन का प्रतीक है। सरकार रविवार को नहीं चलती, लेकिन खड़ी सरकारी कार रविवार को भी चलती है। रविवार को चलने वाली सरकारी कार में जरूरी नहीं कि सरकारी साहब हों।

अक्सर आप जब रविवार को बाहर निकलते हैं तो देखते हैं सरकार की कार रोड पर। उसमें बैठे होते हैं, दादा, दादी, बच्चे और उनकी सुन्दर मां। उसमें पर्दे लगे होते हैं, लेकिन वे हटा दिए जाते हैं। सरकार की यही पारदर्शिता अच्छी लगती है। वैसे सरकारी कार शाम को छह के बाद मॉल की पार्किंग, सब्जी मण्डी के किनारे, किसी बड़े शोरूम के सामने इठलाई-सी खड़ी होती है। उसमें कभी मेमसाहब तो कभी उनके बच्चे फटी जीन्स पहने निकलते दिखाई देते हैं। गाड़ी सरकार की, पेट्रोल सरकार का, आदमी सरकार का। जब पति सरकारी है, तो गाड़ी भी सरकार की होनी चाहिए।

रविवार को सरकार बंद और सरकारी गाड़ी काम पर। साहब छुट्टी पर, ड्राइवर नौकरी पर। जब ड्राइवर अपने परिवार को सरकारी गाड़ी में घुमाता है तो समाजवाद नजर आता है। अच्छा लगता है, सब मिलकर सरकारी सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति मानकर उपयोग कर रहे हैं।

सरकारी गाड़ी ड्राइवर चलाता है, साहब नहीं। ड्राइवर क्या आदमी नहीं होता, उसके बाल-बच्चे नहीं होते, उसका समाज नहीं होता, उसके बच्चों का मन नहीं होता, उसकी पत्नी की इच्छाएं नहीं होती। जब साहब की बीवी को वह ऑफिस टाइम के बाद घुमा सकता है, उनके काम ऑफिस टाइम के बाद कर सकता है, तो उसे भी अधिकार है कि वह अपनी बूढ़ी मां को इंडिया गेट सरकारी गाड़ी में घुमा सके। साहब जानते हैं, कार और सरकार भ्रष्टाचार का प्रतीक है और इसमें सबका बराबर का हिस्सा है। उसमें साहब से लेकर चपरासी तक का अनुपात है।

सरकार चलाने के लिए बहुमत के साथ-साथ अनुपात भी होना चाहिए।

कार साहब के घर के सामने या ड्राइवर के घर के सामने। दोनों का सम्मान उसी अनुपात में होता है, जितना सरकार चलाने के लिए हिस्सा होता है।

सब चाहते हैं, घर के सामने खड़ी कार। कार सरकारी हो, अपनी हो या घर पर आए रिश्तेदार की। कार के आते ही दरवाजे खुल जाते हैं, उत्सुकता बढ़ जाती है।

घर आया मेरा परदेसी, प्यास बुझे मेरी अखियों की।

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