दिल-दिमाग का साझा हो फैसला

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सीताराम गुप्ता
जीवन में सही निर्णय लेने का बड़ा महत्व है लेकिन उससे भी अधिक महत्व है सही समय पर निर्णय लेने का। यदि हम उचित समय पर निर्णय नहीं ले पाते तो समय बीत जाने पर बाद में लिया गया निर्णय कितना भी सही क्यों न हो, उसका कोई लाभ हमें नहीं मिल पाता। अत: हमें निर्णय लेने में देर नहीं करनी चाहिए। जो भी फ़ैसला करना हो, शीघ्र करना चाहिए।

लेकिन ये भी कहा गया है कि जल्दी का काम शैतान का। हां, हमें बिना बात जल्दी भी नहीं करनी चाहिए। प्राय: न्यायालयों में न्याय मिलने में विलंब के लिए आलोचना की जाती है। न्याय प्रक्रिया में दोनों बातें ही महत्वपूर्ण होती हैं। कहा जाता है कि जस्टिस हरिड इज़ जस्टिस बरिड और जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाइड। जल्दबाज़ी में न्याय नहीं हो पाता। कहीं चूक रह जाती है और देर से मिला न्याय भी न्याय न मिलने के बराबर ही होता है क्योंकि फैसला देर से आने पर कई बार उसका महत्व ही नहीं रह जाता। अपेक्षा यही की जाती है कि सही समय पर सही फैसला हो सके।

कोई भी निर्णय कितना जल्दी लें अथवा निर्णय लेने में कितना समय लगाएं, ये सबसे महत्वपूर्ण है। सोचने के लिए भी समय अपेक्षित है। इसके लिए उचित परिवेश भी अनिवार्य है। हड़बड़ी अथवा उत्तेजना की अवस्था में भी हम सही निर्णय नहीं ले सकते। किसी के दबाव में अथवा किसी दबाव के अंतर्गत लिया गया फैसला भी ग़लत फैसला हो सकता है। हमें शांत-स्थिर व दबावमुक्त होकर और समस्या के हर पक्ष पर अच्छी तरह से विचार करके ही किसी निर्णय पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।

कई ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो किसी भी विषय में कोई भी निर्णय नहीं ले पाते और समय के हिसाब से जो भी घटित होता है, उसे चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। कुछ लोग यही फैसला नहीं कर पाते कि कोई निर्णय लें या न लें। इसी उलझन में उनका क़ीमती समय अनिर्णय की स्थिति में ही बीतता चला जाता है। ये स्थिति तो बिल्कुल भी ठीक नहीं है। निर्णय लेने में समस्या की प्रकृति के अनुसार कम या ज़्यादा समय लग सकता है लेकिन किसी निर्णय को लगातार टालते रहना या उसे भूल जाना ठीक नहीं हो सकता।

वास्तविकता ये है कि समस्या आने पर हमें कोई न कोई फैसला तो करना ही होता है। कई बार निर्णय लेने की विवशता अथवा बाध्यता भी होती है। अत: कोई भी निर्णय न लेना या न ले पाना बहुत नुकसानदायक हो सकता है। जो फैसले हमें स्वयं करने होते हैं, उन्हें करना ही चाहिए। कोई समस्या समझ से परे हो या कोई संशय हो तो हम दूसरों से परामर्श कर सकते हैं। कई लोग कोई भी निर्णय लेने से इसलिए भी घबराते हैं कि कहीं वे ग़लत निर्णय न ले लें। घबराना ठीक है लेकिन ये भी ठीक है कि हमारे सभी निर्णय एकदम सही नहीं हो सकते। इसके बावजूद हमारे बहुत से निर्णय ठीक होते हैं।

दूसरे, यदि हमने कोई ग़लत निर्णय ले लिया तो उसमें सुधार भी तो किया जा सकता है। उसे बदला जा सकता है। वैसे हर गलत फैसले से हम जितना सीखते हैं, उस गलत फैसले के अभाव में हम सीख ही नहीं सकते। अत: ग़लत फैसले भी हमें जीवन में आगे बढऩे में मदद करते हैं। दकियानूसी विचारों वाले लोगों की दृष्टि में तो दूसरे लोगों के अधिकांश निर्णय गलत और अनैतिक ही होते हैं। इसलिए हमें अपने गलत निर्णयों पर भी ज़्यादा दुखी होने की ज़रूरत नहीं। ज़रूरी है तो बस इतना ही कि हमें निर्भय होकर अपनी निर्णय लेने की क्षमता का विकास करते रहना चाहिए।

ये भी कहा जाता है कि कोई भी निर्णय हमें दिमाग से नहीं, दिल से लेना चाहिए। ये वास्तव में समस्या के स्वरूप पर निर्भर करता है। हर निर्णय न तो केवल मस्तिष्क पर छोडऩा चाहिए और न केवल अंतर्मन पर। हमें समस्या का सही विश्लेषण करके दोनों का ही सही उपयोग करके कोई निर्णय लेना चाहिए। हमारा अंतर्मन हमारे जीवन के अनुभवों का संग्रह होता है। बुद्धि हमें व्यावहारिकता प्रदान करती है। जो निर्णय समग्रता अर्थात जीवनानुभवों और विचार दोनों के उचित तालमेल से लिया जाता है, ऐसा निर्णय ही अधिक उचित व व्यावहारिक हो सकता है।

ऐसा हर निर्णय चाहे वो ठीक हो या ग़लत ही क्यों न हो, हमारे लिए उपयोगी अवश्य होता है। अत: अपने अनुभवों की रोशनी में भली-भांति सोचकर निर्णय अवश्य लें और समय पर ही निर्णय लें। कई बार हमें किसी नकारात्मक स्थिति पर भी निर्णय लेना हो सकता है। कारण कोई भी हो सकता है लेकिन ऐसे निर्णयों को टालते रहना ही श्रेयस्कर है। यदि हमें किसी सकारात्मक स्थिति पर निर्णय लेना हो तो उसे यथासंभव शीघ्र लेकर उसके क्रियान्वयन में देर नहीं करनी चाहिए। हमारे जीवनानुभव और विचार की समग्रता तो यही कहती है।

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