खजाने में बसी जान

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सहीराम
उनकी नीतियां चाहे कितनी ही उदार रही हों जी, पर वे खुद कभी बहुत उदार नहीं रहे। डर इस बात का नहीं है कि लोग उन्हें कंजूस-मक्खीचूस कहेंगे। डर इस बात का है कि कहीं उनकी कंजूसी सरकार पर उसी तरह भारी न पड़ जाए कि कजूंस चमड़ी दे दे, पर दमड़ी न दे। क्योंकि उन्होंने एक बार फिर अपनी जेब को कसकर पकड़ लिया है कि कोई उसमें से कुछ निकाल न ले।

अरे भैया गिरहकटों के बीच थोड़े ही बैठे हो। वे एक बार फिर तिजोरी से चिपटकर बैठ गए हैं। अरे भैया कोई डाकुओं से थोड़े ही घिरे हुए हो। जब उन्होंने फौजियों को वन रैंक, वन पेंशन देने में आनाकानी की तो रामकिशन जैसे एक-आध फौजी की आत्महत्या से मामला निपट गया था। जब उन्होंने सातवें वेतन आयोग में कर्मचारियों को उतना देने से इनकार किया था, जितनी पहले की सरकारें देती रही हैं, तो लोगों में थोड़ी खुसर-पुसर तो हुई थी, उन्होंने नाराजगी भी दिखाई थी, पर चलो निभ गया था।

लेकिन अब जब किसानों की कर्ज माफी की बात चलने लगी है तो वे फौरन वित्त मंत्री की भूमिका छोड़ वित्त रक्षक की भूमिका में आ गए। वे खजाने को ऐसे संभाल रहे हैं, जैसे किसान उसे लूटने आ रहे हों। वे राज्यों से कह रहे हैं-मैं एक धेला नहीं दूंगा। जैसे कोई कंजूस आदमी पत्नी से कह देता है कि महंगाई-वहंगाई मैं न जानूं। रसोई तुम्हें चलानी है, तुम जानो। मैं एक धेला और नहीं दूंगा। वे भी राज्यों से कह रहे हैं कि किसानों का कर्ज माफ करना है, शौक से करो। पर मेरे से उम्मीद मत रखना, मैं तो एक धेला ना दूं।

कर्ज माफी का वादा बेचारे मुख्यमंत्रियों ने तो किया नहीं। विपक्ष वाले क्या करेंगे, खुद भाजपायी मुख्यमंत्रियों ने नहीं किया। वे करेंगे भी क्यों। चुनाव उनके नाम पर थोड़े ही लड़ा जाता है। चुनाव तो मोदीजी के नाम पर लड़ा जाता है। वे ही झूम-झूमकर जनता से पूछते रहते हैं-क्या चाहिए बोलो। कितना दूं बोलो। कम है तो और दूं क्या? किसानों की कर्ज माफी का वादा भी उन्होंने ही किया था।

तो जब वादा प्रधानमंत्री का था तो यह बला मुख्यमंत्रियों के सिर क्यों आ रही है। जेटलीजी, मोदीजी से क्यों नहीं कहते-चुनाव में तो बड़ा लहक कर वादा कर आए, अब करो कर्ज माफी। और हां मेरे से उम्मीद मत रखना, मैं एक धेला नहीं दूंगा। पर मोदीजी से कहने की हिम्मत कौन करे। सो मुख्यमंत्रियों को हड़काया जा रहा है-मैं एक धेला नहीं दूंगा। जो करना है खुद करो।

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