कर्ज वसूली…

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भारतीय बैंकों ने यहां के बड़े औद्योगिक घरानों को जितना कर्जा बांट रखा है, उसमें कितना हिस्सा फंसे हुए कर्जों का है, फिलहाल कोई नहीं जानता। यह रकम सात लाख करोड़ से लेकर बीस लाख करोड़ रुपये के बीच कुछ भी हो सकती है। रघुराम राजन जैसा सख्त रीढ़ वाला इंसान अगर भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर न हुआ होता तो शायद आज भी देश को इस बारे में कोई भनक तक नहीं होती।

कर्जा लेकर खा जाना, या जिस कंपनी के नाम पर इसे उठाया गया है, उसे दिवालिया बताकर कर्जे को चुपचाप ज्यादा फायदे वाले धंधों में लगा देना भारतीय उद्यमी जगत के एक बड़े हिस्से की पहचान बन गई है। ऐसे में रिजर्व बैंक की यह पहल अच्छी है कि उसने सबसे बड़े रद्दी कर्जों वाली 12 कंपनियों को चुनकर कर्जदाता बैंकों को उनके खिलाफ इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) के तहत कार्रवाई शुरू करने का निर्देश जारी कर दिया है। इसके लिए बैंक को मामला नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) के पास ले जाना होगा, जो कंपनी से छह महीने के अंदर कर्ज अदायगी का खाका तैयार करने को कहेगा।

इस अवधि में यह काम संभव नहीं हुआ तो 27० दिन यानी नौ महीने बाद कंपनी या उसके अलग-अलग हिस्सों को बेच कर संबंधित बैंकों, शेयरधारकों और कर्मचारियों का बकाया अदा करने का प्रयास किया जाएगा। यह बात कहने में आसान है, पर करने में कितनी मुश्किल साबित होगी इसका कुछ अंदाजा विजय माल्या केस से लगाया जा सकता है। शराब और एयरलाइंस के बिजनस से जुड़े इस व्यापारी पर भारतीय बैंकों के 9००० करोड़ रुपये बकाया हैं, जो ब्याज जोड़कर अभी तक डेढ़ गुना हो चुके होंगे।

अब से पांच साल पहले 2०12 में ही यह तय हो गया था कि विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस कर्जे चुकाना तो दूर, अपना धंधा चला पाने की हालत में भी नहीं है। इसके कुछ समय बाद यह फैसला भी हो गया कि बैंक माल्या की संपत्ति नीलामी करके अपना बकाया वसूल कर सकते हैं, लेकिन अभी तक एक पैसे की भी उगाही नहीं हो पाई है। ज्यों ही किसी कंपनी के कारोबार पर बैंक या एनसीएलटी की देखरेख शुरू होती है, उसका धंधा मीनार से गिराए गए पत्थर की तरह नीचे आता है।(आरएनएस)

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