अपनों के सितम ने बढ़ाए गम

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अनूप भटनागर
पिछले दिनों यह खबर सुर्खियों में थी कि पाकीजा फिल्म में मीना कुमारी के साथ काम करने वाली सह-कलाकार गीता कपूर को बीमारी की हालत में उनका पुत्र अस्पताल में छोड़कर गायब हो गया। खैर, फिल्म निर्माता अशोक पंडित इस खबर को सुनकर आगे आये। उन्होंने गीता कपूर के इलाज के बिल का भुगतान करने के साथ ही उन्हें एक वृद्धाश्रम में स्थानांतरित करा दिया। यह एक सराहनीय प्रयास है। लेकिन चिंता की बात यह है कि देश में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा का कानून होने और इस कानून के संदर्भ में न्यायिक व्यवस्थाएं होने के बावजूद पुलिस अभी तक गीता कपूर के पुत्र और पुत्री तक क्यों नहीं पहुंच सकी है।

अपने ही देश, समाज और घर परिवार में बेगाने होते जा रहे बुजुर्गों की स्थिति से उच्चतम न्यायालय चिंतित है। वह वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण और सुरक्षा से संबंधित योजनाओं का विवरण केन्द्र सरकार से चाहता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री डॉ. अश्विनी कुमार ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिये उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी, लेकिन इस पर भी सिर्फ तारीखें ही लग रही हैं। वरिष्ठ नागरिकों के कल्याणकारी उपायों के बारे में मोहिनी गिरि की रिपोर्ट 2०11 में आयी थी। इस पर अमल नहीं हुआ। सुनवाई के दौरान एक बार जब न्यायाधीशों ने डॉ. कुमार से सवाल किया तो उन्होंने स्वीकार किया कि सामूहिक रूप से हम इस मामले में विफल हो गये हैं।

न्यायमूर्ति मदन बी. लोकूर की अध्यक्षता वाली सामाजिक न्याय पीठ जानना चाहती है कि वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण की योजनाओं को बेहतर तरीके से देशभर में कैसे लागू किया जा सकता है। न्यायालय ने वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिये कार्यरत गैर-सरकारी संस्था हेल्पेज इंडिया को इस मामले में मदद के लिये न्याय मित्र नियुक्त करने के साथ ही राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण से भी सहयोग करने का अनुरोध किया है। जिससे देश के वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

देखा जा रहा है कि न्यायिक हस्तक्षेप के बावजूद सरकारें और प्रशासन इस समस्या के प्रति बेखबर ही हैं। सवाल यह है कि घर-परिवार और समाज में वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा क्यों की जा रही है? क्या लोगों को 2००7 में बने वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण कानून के कठोर दण्डात्मक प्रावधानों की जानकारी नहीं है या उन्हें इसकी परवाह नहीं है।

एक अनुमान के अनुसार इस समय देश में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या 11 करोड़ से अधिक है और 2०21 तक यह बढ़कर 14 करोड़ 3० लाख हो जाने की उम्मीद है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुये न्यायालय चाहता है कि देश के प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रमों का निर्माण हो, जहां परिवार से त्याग दिये गये वरिष्ठ नागरिक सम्मान के साथ जिंदगी गुजार सकें। वर्ष 1969 में एक फिल्म आयी थी ‘एक फूल दो माली’। इसमें एक गीत की दूसरी पंक्ति थी, ‘आज उंगली थाम के तेरी तुझे चलना मैं सिखलाऊं, कल हाथ पकडऩा मेरा जब मैं बूढ़ा हो जाऊं।Ó करीब दो दशकों के दौरान सामाजिक मूल्यों में आये बदलाव के कारण ‘एक फूल दो माली’ फिल्म के इस गीत की यह पंक्ति तो ऐसा लगता है कि अतीत की बात हो गयी है।

परिवारों में वरिष्ठ नागरिकों की अनदेखी की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर ही संप्रग सरकार ने 2००7 में वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण कानून बनाया था। इस कानून के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। यह सिर्फ कानून की किताबों या संतानों से सताये जाने के कारण वकीलों की शरण लेने वाले वृद्धजनों तक ही सीमित रह गया है।

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