सत्ता के संगतकार

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हिंदू राष्ट्र की माला भारत में बहुत पहले से जपी जा रही है। लिहाजा सौ से ज्यादा हिंदू संगठनों का गोवा में जमा होकर सन 2०23 तक भारत को हिंदू राष्ट्र बना देने का संकल्प सामान्य स्थितियों में रोजमर्रा की चकल्लस ही समझा जाता। लेकिन स्थितियां सामान्य नहीं हैं।

हाल तक हाशिये का तत्व कहलाने वाले आज राजनीतिक दृष्टि से देश के सबसे महत्वपूर्ण सूबे की बागडोर संभाल रहे हैं। गोरक्षा के नाम पर अलग-अलग घटनाओं में दसियों निर्दोष लोग मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। नरेंद्र दाभोलकर जैसे तर्कवादी विचारक की हत्या में शामिल संगठन पुलिस के खौफ से मारे-मारे फिरने के बजाय इस ‘हिंदू राष्ट्र अभियान’ में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। यह सही है कि केंद्र सरकार, बीजेपी या आरएसएस का कोई प्रतिनिधि गोवा के इस अधिवेशन में शामिल नहीं हुआ, लेकिन सरकारी हिंदुत्व की ओर से गोवा के इस जमावड़े की कोई आलोचना भी नहीं की गई है।

हिंदू राष्ट्र का व्यावहारिक अर्थ क्या है, इस पर कोई भी हिंदुत्ववादी कभी विस्तार से नहीं बोलता, लेकिन गोवा के अधिवेशन में इस पर कुछ ठोस बातें कही गई हैं। एक यह कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘सेक्युलर’ शब्द हटा दिया जाए। यह शब्द वहां पहले मौजूद नहीं था, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर इसे आपातकाल के दौरान एक संविधान संशोधन के क्रम में जोड़ा गया था। लेकिन जब यह नहीं था, तब भी भारत के सेक्युलर चरित्र में कोई झोल नहीं था।

जाहिर है, गोवा के हिंदू अधिवेशन का मकसद भारत को आपातकाल से पहले वाली स्थिति में ले जाना नहीं है। इसमें शामिल लोगों ने साफ किया है कि वे भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलने वाली हर सुरक्षा और सुविधा को तत्काल समाप्त करना चाहते हैं, गोवंश के प्रति की जाने वाली किसी भी हिंसात्मक गतिविधि को इंसानों के खिलाफ वैसी ही हिंसा की आपराधिक धाराओं के तहत दंडनीय बनाना चाहते हैं और सभी हिंदुओं को ‘खांटी हिंदू’ बनाना चाहते हैं।

अभी पूरे देश में अपनी उपज के वाजिब दाम और कर्जमाफी को लेकर किसानों का आंदोलन चल रहा है, जिसमें ज्यादातर हिंदू ही हैं, लेकिन इस हिंदू जमावड़े की इस संबंध में कोई राय नहीं है। जगह-जगह दलित उत्पीडऩ की घटनाएं सामने आ रही हैं, हिंदुत्व की पुरानी प्रयोगशाला गुजरात और हाल में इसकी नई प्रयोगशाला उत्तर प्रदेश में भी हिंदू समाज के इस कमजोर तबके के खिलाफ हिंसा का तांडव हुआ, लेकिन हिंदू राष्ट्र के प्रतिपादकों के लिए यह भी चिंता का विषय नहीं है।

घर से लेकर सड़क तक हिंदू महिलाओं के उत्पीडऩ पर हिंदुत्ववादी सरकारें चुप्पी साधे हुए हैं, पर हिंदू हित रक्षकों के लिए यह भी कोई मुद्दा नहीं है। सारी कोशिश इस बात की है कि लोग अपनी परेशानियां भूल कर अन्य धर्मों को ही खलनायक मानते रहें। संक्षेप में कहें तो इस अधिवेशन की भूमिका सत्ताधारी हिंदुत्व के संगतकार की है, जिसे आगे करके वह अपने धतकरमों से लोगों का ध्यान हटाना चाहता है। (आरएनएस)

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