दृढ़ इच्छा शक्ति का परिणाम

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एक लम्बे समय के अन्तराल के बाद दून में अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्यवाही की गयी। एक दशक पूर्व 2006 में कोर्ट कमिश्नर राजेन्द्र कोठियाल के नेतृत्व में पल्टन बाजार में अतिक्रमण के खिलाफ कुछ ऐसी ही कार्यवाही की गयी थी। घंटाघर से लेकर आईएसबीटी तक 6 किलोमीटर लम्बे इस मार्ग को अतिक्रमण मुक्त कराने का यह बड़ा काम शासन-प्रशासन की दृढ़ इच्छा शक्ति के बिना संभव नहीं था जिसकी अब आम आदमी भी सराहना कर रहा है।

भले ही व्यापारियों द्वारा यह कहकर इस कार्यवाही का विरोध् किया जा रहा हो कि वह अतिक्रमण के हिमायती नहीं है लेकिन प्रशासन का अतिक्रमण हटाने का तरीका गलत है। सवाल यह है कि अगर व्यापारी अतिक्रमण के खिलाफ है तो फिर यह अतिक्रमण करने वाले कौन लोग है? जहाँ तक प्रशासन की बर्बर कार्यवाही की बात है तो प्रशासन ने कई माह पूर्व इन दुकानों व मकानों पर रेडक्रास का निशान लगा दिया था यही नहीं पिछले चार माह में तीन बार इन्हे अतिक्रमण हटाने का नोटिस भी जारी किया गया। सच यह है कि व्यापारी इस कार्यवाही को किसी भी तरह से टालने की फ़िराक़ में थे।

एक दूसरा सवाल यह है कि प्रशासन ने सिर्फ उसी निर्माण पर हथौड़ा चलाया है जो अवैध् था। प्रशासन अगर किसी के वैध् निर्माण पर ऐसी कार्यवाही करता तो इसका विरोध् किया जाना चाहिए था। दरअसल प्रशासन की अब यह मजबूरी हो गयी है कि अतिक्रमण हटाना ही पड़ेगा अन्यथा शहर की सड़कों पर बढ़ती भीड़ व वाहनों का दबाव बर्दाश्त नहीं किया जा सकेगा।

यह भी सच है कि इस कार्यवाही की जद में 50-60 साल पुराना अतिक्रमण भी आया गया है जो दुकानदार व व्यापारी इतने लम्बे समय से यहाँ बैठे थे उनकी दुकान व कारोबार उजड़ जाना निश्चित ही पीड़ा दायक है लेकिन शहर को शहर बनाये रखने के लिए कुछ तो कड़वे घूंट पीने ही पड़ेंगे। सिर्फ माडल रोड ही नहीं प्रशासन को पूरे शहर में इसी तरह की कार्यवाही करने व और फिर पुनः अतिक्रमण ने होने देने के भी पुख्ता इंतजाम करने होगें तभी इसका कुछ फायदा होगा।

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