नगर ढिंढोरा, बगल में छोरा

0
135

सुधीश पचौरी
वे फिर खड़े हो रहे हैं और इसलिए खड़े हो रहे हैं कि कहीं राष्ट्रपति का चुनाव बिना फाइट के न हो जाए। वे जनतंत्र की आत्मा बचाने के लिए खड़े हो रहे हैं।
अपने जनतंत्र का यही सौंदर्य है कि कोई भी कहीं से खड़ा होकर बड़े से बड़े तिम्मन खां को चुनौती दे सकता है। संसदीय चुनावों में कभी धरती पकड़ और घोड़े वाले की बड़ी धूम रहती थी, वे हर चुनाव लड़ते थे, हर बार जमानत जब्त कराते थे, लेकिन अगला चुनाव जब आता, वे फिर खड़े हो जाते। वे सचमुच के वीर थे, शायद अब भी हों।

ग्वालियर निवासी आनंद सिंह कुशवाहा उसी परंपरा में आते हैं। वे कविवर अटल जी की इन काव्य पंक्तियों पर चलने वाले लगते हैं कि ‘हार नहीं मानूंगा रार नई ठानूंगा!’ ऐसे लोग कभी नहीं हारते।

उनचास वर्षीय कुशवाहा ने चौथी बार राष्ट्रपति के चुनाव के लिए परचा भरा है। पहली बार चौरानबे में भरा था। तब से अब तक बिला नागा परचा भरते आ रहे हैं। उनका कहना है कि वे बहुत से सांसदों और विधायकों के संपर्क में हैं। उम्मीदवारी के लिए पचास सांसदों और पचास विधायकों का समर्थन चाहिए जो उनके अनुसार शायद उनके पास है। अतीत में भी सांसदों और विधायकों ने समर्थन का भरोसा दिया था!

वे इस कदर उदार हैं कि सिर्फ वादे और भरोसे पर चुनाव लड़ते हैं। वे नेताओं की तरह शक से शुरू नहीं करते। समाज में ऐसे धैर्य-मन कितने बचे हैं?
मैं तो कुशवाहा जी का भक्त हो गया हूं। वे मेरे हीरो हैं। एक तरफ सारा विपक्ष, दूसरी तरफ वे अकेले ही काफी हैं।

‘राष्ट्रपति के चुनाव को बिना फाइट के नहीं जाने देना है’ इस पवित्र उद्देश्य की खातिर अठारह विपक्षी दल किसी तरह इक_े हुए तो बड़ी मुश्किल से एक नाम उछला ‘गोपाल कृष्ण गांधी।’ यानी मिले तो फिर वही ‘गांधी’। उधर शिवसेना ने संघ के मुखिया मोहन भागवत का नाम उछाल दिया। वह इतना ज्यादा उछल गया कि उनको स्वयं इनकार करके बिठाना पड़ा। इस बीच शैतान मीडिया ने लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन का नाम उछाल दिया। अब लेटेस्ट श्रीधरन का नाम चल रहा है। इन नामों को तो कटा ही समझिए। नाम काटने के लिए ही नाम उछाले जाते हैं।

इस बीच भाजपा ने अपने तीन नेताओं की एक कमेटी बना दी है जो विपक्ष से बात कर सर्वानुमति वाला नाम खोजने की कोशिश करेगी।

कुशवाहा जी सामने हैं, फिर भी ये सब किसी और को खोज रहे हैं। कुशवाहा जी कबीर की तरह कह रहे हैं: ‘मुझको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में!Ó लेकिन राजनीति रूपी माया के वशीभूत दल अपने कुशवाहा जी को देख ही नहीं पा रहे!
किसी और का नाम ढूंढऩे में टाइम खोटा करने से बेहतर है कि सत्ता और विपक्ष हमारे कुशवाहा जी की प्रोफाइल पर एक नजर डाल ले। इनकी प्रोफाइल एकदम सटीक है : वे भी चाय वाले हैं, चौदह के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बताया कि उनके पास पांच हजार कैश और कुल दस हजार की चल-अचल संपत्ति थी। उनका कहना है कि जब एक चाय वाला पीएम हो सकता है तो राष्ट्रपति क्यों नहीं हो सकता?

 

ऐसा भी नहीं कि उनको कभी वोट न मिले हों। दो हजार तेरह में उनको तीन सौ छिहत्तर वोट मिले थे। अगर विपक्ष का सहारा मिल जाए तो सचमुच का एक गरीब रायसीना हिल तक पहुंच जाए। एक नई क्रांति हो जाए और जनतंत्र की जय-जय हो जाए। वे साइकिल से केंपेन करते हैं, इसलिए अखिलेश को तो समर्थन देना ही चाहिए। जब वे केंपेन करते हैं तो उनकी पत्नी चाय बनाती-बेचती हैं।

मैं तो कहता हूं कि कुशवाहा जी से बेहतर कोई दूसरा नाम नहीं हो सकता। वे एकदम इंडिपेंडेंट माइंड हैं। अपने आप खड़े हैं। वे इतने जनतांत्रिक हैं कि बिना फाइट के कोई चुनाव नहीं होने देते। एकदम निर्विवाद हैं। इसलिए उनके नाम पर सर्वानुमति हो जानी चाहिए! मैं सांसद होता तो उनके लिए अभियान चलाता। उनको जिताता। ऐसे उम्मीदवार को छोड़ ये तमाम दल किसे खोज रहे हैं?

कुशवाहा जी यंग हैं, उत्साही हैं और राष्ट्रसेवा की भावना से ओतप्रोत हैं। तभी तो हर बार खड़े हुए हैं। कैसी विडंबना है कि ‘बगल में छोरा शहर में ढिंढोरा!’ मैं तो कहूंगा कि एक बार कुशवाहा को ट्राई करके तो देखें। इतिहास बन जाएगा। एक चाय वाला राष्ट्रपति भी बन जाएगा।

LEAVE A REPLY