भाषा-भ्रम से उपजी मुश्किलें

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प्रमीला गुप्ता
संभवत: बाबा आदम और हव्वा भाषा जानते ही नहीं थे। पशु-पक्षियों की ही भांति वे भी विशिष्ट इशारों की भाषा में बात करते होंगे। पता नहीं कब? कहां? कैसे? भाषा का जन्म हुआ। जो भी हो, एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि विश्व का कोई भी कोना हो, कोई भी भाषा हो, वस्तु विशेष अथवा प्राणी विशेष का भाव एक ही होता है। ‘मां’ को भले ही ‘अम्मा’, ‘आई’, ‘बीजी’, या फिर ‘मम्मी’ कह कर पुकारें परंतु मां का स्वरूप प्रत्येक भाषा में एक ही होगा-वात्सल्यमयी जननी।

इसी प्रकार ‘जल’ को किसी भी नाम से संबोधित करें, उसका रूप, गुण एक ही होगा। यह भी एक तथ्य है कि प्रत्येक दस कोस के बाद भाषा का रूप बदल जाता है। यह बदला हुआ रूप कभी-कभी बहुत ही हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न कर देता है। कभी-कभी तो इसके कारण टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

ऐसी ही एक घटना याद आती है। विवाह के बाद अम्बाला छावनी से मुजफ्फरनगर ससुराल गयी थी। वहां पर एक दिन मां जी ने पूछा-बहू, घर में बजरी है? समझ नहीं पाई। मेरे विचार में तो कंकड़-पत्थर को ही बजरी कहते हैं, सड़क, मकान बनाने में काम आती है। नयी-नयी शादी हुई थी। अधिक पूछना उचित नहीं समझा। अनजाने में ही ‘हां’ कर दी।

शाम के समय चाय बनाते समय देखा कि चीनी खत्म हो गयी थी। मां जी से कहा-मां जी, चीनी खत्म हो गयी है। मां जी थोड़ा नाराज़ होकर बोली-सुबह तो तुमसे पूछा था तब तो तुमने कह दिया था कि है। मैं सोच में पड़ गयी। मैंने कहा—आपने तो सुबह बजरी के लिए पूछा था। यहां पर क्या चीनी को बजरी कहते हैं।

‘हां, हम तो बजरी ही कहते हैं।’ अब समझ में आया कि किस प्रकार हर दस कोस पर भाषा अपना रूप और स्वर बदल लेती है।

हिन्दी भाषी ही हिन्दी न समझ पाएं, कितनी अजीब बात है। यदि दो भिन्न प्रांतीय भाषा-भाषी आपस में मिल जाएं तो कैसी विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है, देखते ही बनती है। बंगाली बाबू नए-नए सपरिवार मुंबई में आए थे। एक दिन बाज़ार गए तो उनका दो-तीन साल का बेटा भीड़ में गुम हो गया। बेचारे, पूछते फिर रहे थे-की आपनि आमार एक ठो खोखा देखे छे?

जिससे भी पूछते वही हंसने लगता। सौभाग्य से एक भद्र मराठी सज्जन मिल गए। वे बांग्ला भाषा भी जानते थे। पूछा—क्या बात है? क्यों परेशान हो? बंगाली महाशय ने अपना दुखड़ा सुना डाला। वे बोले—भाई, मराठी भाषा में खाली डिब्बे को ‘खोखा’ कहते हैं। इसी कारण से लोग हंस रहे हैं। बंगाली बाबू ने भद्रपुरुष की सहायता से अपना बेटा ढूंढ़ निकाला।

कभी-कभी तो एक भाषा का आदरणीय शब्द दूसरी भाषा में गाली का द्योतक होता है और नौबत आ जाती है मारपीट की। दिल्ली के एक फ्लैट में पंजाबी दंपति रहते थे। कुछ समय बाद सामने वाले फ्लैट में नवविवाहित दंपति आ गए। वे आंध्र प्रदेश के निवासी थे। पति सुबह ही आफिस चले जाते, पत्नी सारा दिन घर अकेले बैठे-बैठे बोर हो जाती थी। सामने के फ्लैट में रह रही महिला से दोस्ती के लिए वह दरवाजे पर खड़े हो कर बड़े प्यार से पुकारने लगी—ए रंडी! ए रंडी (यहां आइए)। इतना सुनते ही पंजाबी महिला उसको मारने के लिए दौड़ पड़ी। बोली—मैनूं गालां कढ़दी ए। हूणे दसनी हां।

भाषाओं का यह चक्रव्यूह अतीव दुरूह है। बांग्ला भाषा में अमरूद को ‘पिआरा’ कहते हैं जबकि हिन्दी भाषा में इसका अर्थ है प्रिय। तमिल भाषा में ‘मोर’ को लस्सी को कहा जाता है, हिन्दी में ‘मोर’ एक वन्य प्राणी है। तेलुगू भाषा में ‘नैया’ शब्द घी के लिए उपयुक्त होता है, हिन्दी में नौका के लिए।

संसार में अनेक भाषाएं हैं। इस युग में दो भाषाओं का कहीं न कहीं टकराव होना स्वाभाविक है। इस टकराव को हमें सहज भाव से स्वीकारना चाहिए। इसी में निहित है मातृभाषा, राष्ट्रभाषा का सम्मान।

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