जनचेतना से होगी आबादी नियंत्रित

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की उस पहल का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए, जिसमें अनियंत्रित आबादी को रोकने के लिये रचनात्मक शुरुआत की गई है। देश के तीव्र जन्म दर वाले सात राज्यों के 146 जनपदों में चलने वाली मुहिम का उज्ज्वल पक्ष यह है कि इसमें नयी-पुरानी पीढ़ी की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। जिसके क्रम में सास-बहू सम्मेलन आयोजन की बात है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बड़े परिवारों का खमियाजा महिलाओं को अपने स्वास्थ्य व बदहाल आर्थिक स्थिति के रूप में चुकाना पड़ता है। सास-बहू का संवाद इसलिये भी रचनात्मक है कि महिला ही महिला को बेहतर ढंग से समझ सकती है। इससे न केवल मां-बच्चे के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा बल्कि देश? भी जनसंख्या वृद्धि के नकारात्मक परिणामों से बच सकेगा।

जरूरत इस बात की है कि परिवार नियोजन का यह अभियान महज खबरों में बने रहने के लिये न हो बल्कि वास्तविक रूप से स्थिति में बदलाव आये। यदि समय रहते ऐसा हो पाता है तो आने वाले दशकों में देश की आबादी चीन से अधिक होने की चिंता से मुक्ति मिल सकेगी।

बीसवीं सदी में अर्थशास्त्री माल्थस ने चेताया था कि यदि जनसंख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ती है तो प्रकृति प्राकृतिक आपदाओं के जरिये उस पर अंकुश लगाती है। उनका तर्क था कि जनसंख्या जहां बीज गणितीय अनुपात से बढ़ती है वहीं खाद्यान्न अंक गणितीय अनुपात में बढ़ता है।?इसके अंतर से तमाम तरह के संकट सामने आते हैं। हालांकि कृषि अर्थशास्त्री माल्थस के इस सिद्धांत से सहमत नहीं थे और इसे क्रूर व्याख्या बताते थे।(आरएनएस)

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