वर्चस्व की लड़ाई का खाड़ी संकट

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मोहम्मद शहजाद
आतंकवाद के वित्त पोषण मामले में कतर और सऊदी अरब के मध्य ‘ज्मौसेरे भाई’ वाला रिश्ता है। तेल और प्राकृतिक गैस के अकूत भंडार, मजबूत अर्थव्यवस्थाएं, जीसीसी की सदस्यता, सुन्नी राष्ट्र और राजशाही जैसी समानताएं भी दोनों में हैं। ऐसे में तो दोनों को एक-दूसरे का करीबी और चहेता होना चाहिए था।

फिर आखिर क्या कारण है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व में खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के अन्य सदस्य बहरीन समेत मिस्र, लीबिया, यमन, मालदीव, उर्दन और सेनेगल जैसे कई मुस्लिम राष्ट्रों ने कतर के साथ अपने राजनयिक सम्बंध तोड़कर उसे अलग-थलग कर दिया। इससे खाड़ी क्षेत्र में गंभीर राजनीतिक संकट गहरा गया है।

नि:संदेह अगर ये संकट अत्यधिक गहराता है तो इसके परिणाम भी दीर्घकालिक होंगे। आखिर असल वजहें क्या हैं और इसका मकसद क्या है? सवाल गूढ़ हो जाते हैं कि विदेश नीति को लेकर तमाम विरोधाभासों के बावजूद इस मामले पर रियाद और आबूधाबी ने गजब की एकजुटता दिखाई है। इन दोनों देशों के बीच ही ये तमाम तानाबाना रचा गया है। देखा जाए तो पूरे मामले की जड़ में दोनों देशों का समान दुश्मन ‘ईरान’ है।

जैसे किसी एक के दो दुश्मनों के बीच मित्रता बढऩे लगती है, वैसे ही सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के मध्य कई मुद्दों पर तकरार के सबब हालिया दिनों में पैदा हुई दूरियां भी अब नजदीकियों में बदल गईं। इसमें सबसे बड़ा रोल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया सऊदी यात्रा का है। अपने पहले विदेशी दौरे में सर्वप्रथम सऊदी अरब को चुन कर, उसे बेजा तरजीह देकर और फिर उसकी सरजमीं से ईरान को ललकार कर ट्रंप ने सऊदी और यूएई के शेखों को ये एहसास दिलाया है कि व्हाइट हाउस में अब उनके हितों की रक्षा करने वाले शख्स का बसेरा है।

ओबामा दोनों देशों को अलग-अलग नजरिए से देखते थे और ईरान पर वर्षों से चले आ रहे प्रतिबंधों को हटाकर उन्होंने अमेरिका-ईरान सम्बंधों में नई सुबह का आगाज किया था। ट्रंप द्वारा फिर से सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का ‘कस्टोडियन’ साबित करने से इन दोनों देशों को बल मिला और इन्होंने कतर को अलग-थलग कर क्षेत्र में ईरान के साथ चल रही वर्चस्व की लड़ाई में एक पासा फेंका है। ये पासा कारगर साबित होगा, इसकी उम्मीदें कम हैं।

असल में कभी सऊदी अरब की आंखों का तारा रहा कतर पिछले कुछ समय से उसे खटकने लगा है। विशेषकर 2०1० में ट्यूनीशिया में भड़के विद्रोह के बाद से शुरू हुए ‘अरब वसंत’ को समर्थन देने और इन देशों में लोकतंत्र की स्थापना के प्रति कतर की वचनबद्धता से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को भी अपनी बादशाहत डांवांडोल होती नजर आने लगी। फिर 2०13 में कतर में हुए नेतृत्व परिवर्तन ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी। कतरी अमीर शेख तमीम बिन हम्माद अस-सानी तो अरब क्रांतिकारियों के और बड़े समर्थक निकले।

कतर ने मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड समेत दीगर नरम इस्लामिक समूहों की हिमायत की और लोकतांत्रिक तौर पर चुने गए वहां के पहले राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी के साथ ये समर्थन और तेज हो गया। मुर्सी के चयन ने सऊदी अरब और कतर को और बेचैन कर दिया। इसीलिए इन दोनों ने 2०13 में मुर्सी को अपदस्थ करने में सेना की मदद की। यही नहीं, कतर ने यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व में लड़ रही फौजों के खिलाफ हौसी विद्रोहियों की मदद की, िफलीस्तीन में हमास का साथ दिया और सीरिया में भी उसने राष्ट्रपति बशर अल असद को अपदस्थ करने में सऊदी अरब से अलग लाइन चुनी।

कतर की दूसरे देशों के साथ इस कतारबंदी से साफ हो गया है कि दोहा की सरकार खाड़ी देशों विशेषकर सऊदी अरब से अलग अपनी विदेश नीति पर अमलपैरा है। जीसीसी के दो अन्य सदस्य कुवैत और ओमान ने पहले से ही एक अलग परिपाटी अपना रखी है और उनका रवैया ज्यादा मुखर न होकर हमेशा निष्पक्ष, बीच-बचाव और संतुलन बनाए रखने वाला रहा है। कतर के जरिए भी खुद को इससे मुक्त करने के प्रयासों से जीसीसी में भी सऊदी अरब और यूएई को अपना प्रभुत्व कम होता प्रतीत होने लगा।

फिर कतर का ईरान की तरफ बढ़ता झुकाव और तुर्की से प्रगाढ़ होते उसके रिश्तों से सऊदी अरब और यूएई गुस्से से तमतमा गए। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की शह पाकर कतर को अलग-थलग कर उसके साथ-साथ कुवैत और ओमान को भी संदेश देने की कोशिश की है।

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