म्यांमार में चीनी दखल चिंतनीय

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जी. पार्थसारथी
जब म्यांमार में पिछले आम चुनाव में आंग सान सू की जीत कर आई थीं तब आमतौर पर यह उम्मीद बंधी थी कि पश्चिमी जगत में अपनी अच्छी छवि रखने वाली इस नेत्री की सरकार को अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देशों से काफी मात्रा में आर्थिक सहायता मिलेगी। लेकिन आज वस्तुस्थिति यह है कि म्यांमार में अनेक सशस्त्र और प्रभावशाली गुट अपना विद्रोह जारी रखे हुए हैं। शांति बनाने के अलावा आंग सान की दूसरी सबसे बड़ी प्राथमिकता आर्थिक विकास को बढ़ाने हेतु यथेष्ठ परिस्थितियां बनाने की थी।

हालांकि पश्चिमी जगत द्वारा मिलने वाली आर्थिक मदद का भ्रम तो पूरा नहीं हो पाया, अलबत्ता कृषि उत्पादन में विविधता लाकर वह अपना दूसरा ध्येय प्राप्त करती जरूर दिखाई दी हैं, जब देश की आर्थिक विकास दर लगभग 8 प्रतिशत दर्ज की गई है।

जातीय शांति बनाने के लिए किए गए आंग सान के प्रयासों की सराहना करने की बजाय पश्चिमी देशों और कतिपय प्रभावशाली मुस्लिम मुल्कों जैसे कि तुर्की और मलेशिया ने रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर म्यांमार पर दबाव डाला है। केवल जापान और भारत ने ही म्यांमार की अंदरूनी परिस्थितियों को ठीक से समझा है। जबकि चीन ने रोहिंग्या-समस्या में मध्यस्थता करने की पेशकश करके अपने इस दक्षिणी पड़ोसी को शर्मिंदगी का एहसास करवाया है।

आंग सान दो बार चीन की यात्रा पर गई हैं और वहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली केकियांग से मुलाकात करने के बावजूद यह म्यांमार की जातीय समस्या पर चीन का आधिकारिक रवैया ही है, जिसके चलते म्यांमार उसकी गिरफ्त में आने को मजबूर है।

बारमा जाति की बहुलता वाले म्यांमार में लंबे समय से अनेक जातीय गुटों का विद्रोह चलता आ रहा है, जिसमें अल्पसंख्यक वर्गों के 22 सशस्त्र समूह लिप्त हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा ताकतवर यूनाइटेड डब्ल्यू स्टेट आर्मी (यूडब्ल्यूएसए) नामक संगठन है, जिसके पास 25००० से ज्यादा सशस्त्र कारकुन हैं। इसके बाद नंबर आता है 5००० विद्रोहियों वाले काचिन इंडीपेंडेंट आर्मी (केआईए) का, जो भारत-चीन-म्यांमार के त्रिकोणीय सीमांत इलाके में सक्रिय है।

इन दोनों गुटों को हथियार और अन्य सामरिक मदद चीन से मिलती है। केआईए साथ लगते चीन के युन्नान प्रांत से मिलने वाली आधिकारिक सलाह पर भारत के उत्तर-पूर्वी अलगाववादी गुटों जैसे कि उल्फा और एनएससीएन (खपलांग) विद्रोहियों की मदद करता है। चीन ने यूडब्ल्यूएसए को आधुनिक हथियारों से लैस कर रखा है, जिसका इस्तेमाल वह म्यांमार के अशांत सूबे शान में अपनी हिंसक गतिविधियां चलाने में करता है।

हिंद महासागर तक सुगम पहुंच बनाने के इरादे से चीन म्यांमार की जमीं को एक पुल की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। पहले-पहल वह पश्चिमी देशों और आंग सान की चुनावी जीत को लेकर चिंतित जरूर था लेकिन चीन ने बड़ी दक्षता से म्यांमार की सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों का दोहन करते हुए आखिरकार आंग सान को इस बात पर ‘राजी’ कर ही लिया कि सशस्त्र अलगाववादी गुटों से की जाने वाली शांति-वार्ताओं में वह उसकी राय को भी महत्व देंगी।

इसकी एवज में चीन ने रोहिंग्या मुस्लिम पर अत्याचारों के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में पश्चिमी देशों द्वारा की गई आलोचना से उनकी सरकार का बचाव किया है। खबरों के मुताबिक चीन ने यूडब्ल्यूएसए को शांति-स्थापना के लिए ‘मना लिया’ है और कहा जा रहा है कि वह केआईओ को भी ऐसा करने को ‘प्रेरित’ कर रहा है। म्यांमार में चीनी राजदूत ने केआईओ ने शांति वार्ता को ‘सिरे चढ़ाया’ है और इस घटनाक्रम पर भारत को नजर रखनी होगी।

199० के दशक से ही म्यांमार में चीनी कंपनियां बड़े पैमाने पर ऐसी खनन परियोजनाएं चला रही हैं, जिनमें पर्यावरणीय नुकसान और विस्थापन जैसी समस्याओं की जरा भी परवाह नहीं की जा रही। म्यांमार में संवैधानिक रूप से चुनकर आए पहले राष्ट्रपति थीन सेन को लोगों के भारी विरोध की वजह से 3.6 बिलियन डॉलर की लागत से बनने वाली मईत्सोने बांध पनबिजली परियोजना रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

वहीं भारी विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद आंग सान ने निजी तौर पर दखल देकर तांबे के खनन में लगी चीनी साझेदार कंपनी को मुनाफे का 3० फीसदी देने की विवादित मंजूरी दे डाली है।म्यांमार में अन्य विवादित चीनी परियोजनाओं में 7.3 बिलियन डॉलर की लागत से बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित क्योक बंदरगाह का विकास करना है। इस परियोजना में चीन 7० से 85 फीसदी हिस्सा अपने पास रखेगा।

बंदरगाह की सुविधा के अलावा यहां 4289 एकड़ में ‘क्योक प्हू आर्थिक क्षेत्र’ बनाया जाएगा, इसमें भी चीन का हिस्सा 51 फीसदी होगा। कहा जा रहा है कि अगर म्यांमार ‘क्योक प्हू बंदरगाह’ के लिए चीन द्वारा तय की गई शर्तों को मान जाता है तो वह मईत्सोने पनबिजली परियोजना पर जोर नहीं देगा। चूंकि क्योक प्हू का अधिकांश नियंत्रण चीन के पास होगा। यहां भी चीनी नौसैन्य जहाजों का आना-जाना लगा रहेगा।

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