फिर सुलगा गोरखालैंड

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गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन फिर तेज हो गया है। इस मांग को स्थानीय आबादी का अच्छा समर्थन हासिल है। इसी वजह से न केवल बंद का आह्वान असरदार है बल्कि कई गुटों में बंटी आंदोलनकारी ताकतें भी एकजुट होती दिख रही हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) द्वारा बुधवार को बुलाई गई बैठक में उसकी सहयोगी पार्टी बीजेपी ही नहीं, प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली स्थानीय पार्टियां जीएनएलएफ और सीपीआरएम भी शामिल हुईं।

शांति-व्यवस्था बहाल करने के लिए राज्य सरकार ने सीआरपीएफ के अलावा माओवादियों से मुकाबले के लिए खास तौर पर तैयार की गई सीआईएफ (काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स) को भी लगाया है। सेना की छह टुकडिय़ां भी इलाके में तैनात की गई हैं। इन उपायों से इस बात का अंदाजा हो जाता है कि अलग गोरखालैंड राज्य की मांग हवाई नहीं है।

काफी लंबे समय से चल रहे इस आंदोलन के कुछ ठोस कारण हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह इलाका पश्चिम बंगाल की मुख्यधारा से बहुत दूर है और भाषा-संस्कृति का बंगाली तत्व यहां काफी कमजोर है। साफ है कि अलग गोरखालैंड की मांग को महज विकास की आकांक्षा के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे पर्यटन और चाय की भिन्न अर्थव्यवस्था के अलावा अलग पहचान सवाल का भी है। विकास के मामले में पश्चिम बंगाल के बाकी हिस्सों का हाल भी ऐसा नहीं है कि गोरखालैंड वाले उसके साथ रहने को लालायित हों। इस पहाड़ी इलाके को विकास के एक अलग मॉडल की भी दरकार है।

अस्सी के दशक में अलग गोरखालैंड राज्य की मांग काफी तेज हुई थी, लेकिन एक स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा पा लेने के बाद यह शांत हो गई थी। उसके करीब तीन दशक बाद यह लहर आज एक बार फिर से उठी है तो इसके पीछे उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य की स्थापना और हाल में बनाए गए तेलंगाना की मिसाल भी है।

इसके अलावा बीजेपी खुद को शुरू से छोटे राज्यों के पक्ष में बताती रही है। इसलिए उसके केंद्र में रहते गोरखालैंड समर्थकों की उम्मीदें बढऩा स्वाभाविक है। कुल मिलाकर इस मांग से आंखें मूंदे रहना कोई हल नहीं है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हालात काबू के बाहर होने से पहले संबंधित पक्षों के साथ बातचीत शुरू कर देनी चाहिए।

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