ऊबराइजेशन का फॉर्म्युला

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भारतीय महानगरों में लगभग हर किसी के काम आ रही अमेरिकी कार शेयरिंग कंपनी ऊबर फिलहाल दो वजहों से चर्चा में है। पूरी दुनिया में सबसे तेज तरक्की करने वाली इस स्टार्ट-अप कंपनी के सात आला अधिकारियों को इसी साल विभिन्न आरोपों में कंपनी छोड़कर जाना पड़ा है। इसके वैल्युएशन को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।

लेकिन अपने घर में विभिन्न समस्याओं की शिकार इसी कंपनी के वर्किंग मॉडल में भारत की नामी-गिरामी आईटी कंपनियों को अपनी सद्गति नजर आ रही है। ऊबर का वर्किंग मॉडल यह है कि जिन टैक्सियों की सेवाएं वह अपने ग्राहकों को मुहैया करा रही है, वे किसी और की हैं। न ड्राइवर रखने की किचकिच, न गाडिय़ों के ईंधन और मेंटिनेंस का झंझट।

देश-विदेश में तमाम संकटों से जूझ रही भारतीय आईटी कंपनियों को लग रहा है कि यही तरीका अगर वे सॉफ्टवेयर इंजिनियरों को लेकर अपना लें – उन्हें नियमित नौकरी पर रखने के बजाय प्रॉजेक्ट की जरूरतों के अनुरूप ही उनकी सेवाएं लें – तो न सिर्फ उनके स्थायी खर्चे बचेंगे, बल्कि कर्मचारियों से जुड़ी हर तरह की जिम्मेदारी से भी वे मुक्त हो जाएंगी।

अभी यह वर्किंग मॉडल सिर्फ पुणे स्थित एक छोटी आईटी कंपनी द्वारा ही अपनाया गया है, लेकिन निकट भविष्य में टीसीएस, इनफोसिस और विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों को भी हम शायद इसी दिशा में बढ़ते देखें। हां, ऊबर का मॉडल पूरी तरह अपनाना शायद उनके लिए संभव न हो, क्योंकि अपनी बुनियादी चीजों का साझा वे घुमंतू सॉफ्टवेयर कामगारों के साथ नहीं करना चाहेंगी।

लेकिन किनारे पडऩे वाले दस-बीस फीसदी कामों के लिए वे प्रॉजेक्ट-बेसिस पर सीधे या किसी थर्ड पार्टी के जरिये उनकी सेवाएं ले सकती हैं। इसके लिए नई पीढ़ी के इंजिनियरों की मानसिकता का भी हवाला दिया जा रहा है, जो कहीं बंध कर काम करना पसंद नहीं करते। लेकिन सरकारों और समाज के जिम्मेदार लोगों को यह जरूर सोचना चाहिए कि ये नई पीढ़ी के इंजिनियर अब से दस-पंद्रह साल बाद भी ऐसे ही तो नहीं रहेंगे।

कहीं ऐसा न हो कि जब उन पर अपना परिवार चलाने, बच्चे पालने की जिम्मेदारी आए तो उनके पास स्थायी काम और सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कुछ भी न हो!(आरएनएस)

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