लुभावने जुमलों का तार्किक विवेचन जरूरी

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राजेन्द्र चौधरी
पिछले दिनों कुछ अखबारों में एक पूरे पेज का विज्ञापन छपा, जिसमें पांच मुद्दों पर जनता को जागरूक करने का आह्वान हुआ। एक समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर सांसद राजकुमार सैनी ने इन बिन्दुओं को चिन्हित किया है। दरअसल, सतही तौर पर आकर्षक दिखने वाले मुद्दे नकारात्मक निष्कर्ष देते हैं। पहली मांग, सभी जातियों को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण देना यानी सौ फीसदी आरक्षण हो। तो फिर जातीय आधार पर आरक्षण केवल नौकरियों में ही क्यों, जीवन के हर क्षेत्र में क्यों नहीं? संपत्ति, भूखंडों और ठेकों के आवंटन इत्यादि में जातिगत आधार पर सौ फीसदी आरक्षण क्यों न हो?

चुनावों में तो जाति के आधार पर टिकट और वोट तो मांगे ही जाते हैं, इन्हें कानूनी रूप देने का तर्क है यह। इस पूर्ण आरक्षण का अर्थ है कि हम जातीय पहचान और उससे जुड़े विभेद को वांछित समझते हैं। समाचार पत्रों के अनुसार सांसद ने ब्राह्मण समाज से भेंट यह कहकर लेने से इनकार कर दिया कि ब्राहमण को तो भेंट दी जाती है। यानी इस आरक्षण सोच से परंपरागत भेदभाव को स्थायी कर देना है, अंतरजातीय विवाहों का खात्मा।

संभव है जाति कभी एक जैसी आर्थिक-व्यवसायगत परिस्थिति का परिचायक रही हो। आज इसमें सामाजिक व आर्थिक रूप से अभूतपूर्व बदलाव आया है। अमेरिका या मुंबई में जन्मे और पले-बढ़े व्यक्ति की दूर देहात में रहने वाले अपने सजातीय व्यक्ति के जीवन से क्या समानता है? समान पुरखे भी केवल पितृ पक्ष से। अगर हम माता की वंशावली को भी महत्व दें तो हमारी जाति एवं गोत्र वो नहीं होंगे, जो हम आज के दिन मानकर चल रहे हैं।

इसलिए ये अतार्किक पहचान है। सवाल है कि फिर भाषागत, क्षेत्रीय, गोत्रीय या धार्मिक पहचान क्यों नहीं? अगर जातिगत या किसी अन्य पहचान के आधार पर सौ फीसदी आरक्षण होता है तो फिर न्याय भी गुण-दोष, गलत-ठीक के आधार पर न होकर जातीय पहचान के आधार पर होंगे।

राज्यसभा को चुनाव हारे ‘नामित’ व्यक्तियों का सदन बताया गया है जो जनता द्वारा चुनी हुई लोकसभा की राह में रोड़ा बनती है। इसलिए इसे भंग करने की मांग की गई है। राज्यसभा दरअसल जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का सदन है। यह राज्यों की विधानसभाओं का प्रतिनिधि सदन है। एक संघीय संवैधानिक ढांचे में राज्यों की महत्ता को नकार देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। लोकतन्त्र में बहुमत का एक महत्वपूर्ण स्थान है पर बहुमत अधिनायकवाद में नहीं बदलना चाहिए। इसलिए राज्यसभा का स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना भारत में लोकतन्त्र और संघीय ढांचे को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

तीसरा प्रश्न एक परिवार-एक सरकारी नौकरी का है। यह सुझाव पराजय स्वीकार करने की निशानी है। यह मान्यता है कि सरकारी नौकरियां तो रेवडिय़ां हैं, जो बिना किसी योग्यता के बांटी जाती हैं। इसलिए एक परिवार में एक ही मिलनी चाहिए। एक परिवार से कोई एक डाक्टर, एक वकील या व्यापारी की बात क्यों नहीं उठती? सभी नौकरियां पारदर्शी तरीके से योग्यता (न्यूनतम आवश्यक आरक्षण पर) आधारित होनी चाहिए। सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण का एक बड़ा कारण निजी क्षेत्र की असुरक्षा और सेवा शर्तें हैं।

चौथा सवाल मनरेगा का है, जिसके बारे में कहा गया है कि ‘धन ज् मजदूरों को खाली बिठा कर बांटा जा रहा है।’ मनरेगा का कानून यह कहता है कि अगर कोई मज़दूर परिवार मेहनत मजदूरी करने को तैयार है और उसे काम नहीं मिल रहा तो उस परिवार को साल भर में 1०० दिन मेहनत-मजदूरी का काम दिलवाना सरकार की जिम्मेदारी है। बाज़ार में पर्याप्त मज़दूरी न मिलने की अवस्था में यह उसकी क्षतिपूर्ति की व्यवस्था है। मनरेगा का काम खेतों इत्यादि में मिलने वाले काम से अलग, काम के अवसरों की बढ़ोतरी के लिए है, न कि उसके स्थान पर है।(आरएनएस)

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