ट्रंप चाल से नाटो में अविश्वास

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पुष्परंजन
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) बना इसलिए, ताकि उत्तर अमेरिकी और यूरोपीय देशों पर कभी हमला होता हो तो उसकी रक्षा के वास्ते सदस्य देश सामूहिक रूप से मुकाबला करें। 4 अप्रैल 1949 को इस सैनिक गठजोड़ पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने हस्ताक्षर किये थे। इस समय नाटो सदस्य देशों की संख्या 29 है। 5 जून 2०17 को मोंटेनीग्रो नाटो का 29वां सदस्य देश बना है।

इसके अतिरिक्त 21 ऐसे देश हैं जो नाटो में शांति के लिए सहकार कार्यक्रम ( पार्टनरशिप फॉर पीस प्रोग्राम) से जुड़े हुए हैं और 15 देशों को ‘इंस्टीट्यूशनलाइज़्ड डॉयलाग’ से जोड़ लिया गया है। लेकिन क्या यह सब कुछ सामान्य गति से चलता रहेगा? इस बात की वजह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दिया हालिया बयान है, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि अमेरिका ही क्यों नाटो पर सबसे अधिक पैसे खर्च करे।

इस संगठन की बुनियाद के समय तय यह हुआ था कि सदस्य देश अपनी जीडीपी का दो प्रतिशत नाटो को देंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। जर्मनी जैसा आर्थिक रूप से ताकतवर देश अपने जीडीपी का मात्र 1.2 प्रतिशत दे रहा था तो ट्रंप ने चिढ़कर मैर्केल के विरुद्ध आवाज़ तेज़ की। यह सही है कि नाटो को टिकाये रखने के लिए अमेरिका को दो प्रतिशत ही नहीं, बल्कि अपने जीडीपी का 3.6 देना पड़ रहा है।

यूरोप के तीन ऐसे देश हैं जो कमज़ोर आर्थिक स्थिति के बावजूद दो प्रतिशत से अधिक अनुदान नाटो को दे रहे हैं। इनमें ग्रीस 2.36, एस्तोनिया 2.18, पोलैंड 2.०1 प्रतिशत आर्थिक मदद दे रहे हैं। ब्रिटेन सक्षम है और उसका योगदान 2.17 फीसदी है। फ्रांस 1.79 प्रतिशत, तुर्की 1.69, इटली 1.11 और कनाडा द्वारा 1.०2 फीसदी के योगदान से यही लग रहा है कि अपरोक्ष रूप से इनका बोझ अमेरिका ढो रहा है।

नाटो के खुद का मिलिटेरी बजट 1.4 अरब डॉलर का है। यह पैसा रणनीति बनाने, रिसर्च और ट्रेनिंग पर खर्च हो जाता है। 2०17 में नाटो ने कुल ख़र्च का आकलन किया तो यह 921 अरब डॉलर बनता है। इससे अलग सिविलियन बजट पर सवा पच्चीस अरब डॉलर का अतिरिक्त ख़र्च है। नाटो अब एक ऐसा हाथी साबित हो रहा है, जिसे पालना सदस्य देशों के बूते में नहीं लगता। इसे भांप कर ही, कुछ सदस्यों ने अपने देश के रक्षा बजट को बढ़ाना शुरू किया है ताकि संकट के समय नाटो पर आश्रित न रहा जाये।

रूस की सीमा से लगा लातविया सबसे ताज़ा उदाहरण है, जिसने अपने रक्षा बजट में 42 फीसदी का इजाफा किया है। उसका पड़ोसी लिथुआनिया 24 प्रतिशत रक्षा बजट बढ़ाकर इसकी तैयारी में लग गया कि कभी रूस ने हमला किया तो बचने के लिए नाटो को गुहार न लगानी पड़े। इससे संदेश यही गया है कि नाटो सदस्यों के बीच भरोसे का स्खलन हो रहा है।

इसमें दिक्कत की बात यह है कि जिन सदस्य देशों के पास अपनी ख़ुद की सेना नहीं है, उनका क्या होगा? उदाहरण के लिए आइसलैंड है। यह देश रक्षा के मामले में पूर्णत: नाटो पर निर्भर है। आंतरिक सुरक्षा पर आइसलैंड ०.1 प्रतिशत ख़र्च करता है। कुछ ऐसे सदस्य देश भी हैं, जिनके पास किसी हमले को रोकने के लिए बड़ी सेना नहीं है। ऐसे सदस्य देश आपात स्थिति में क्या करेंगे, यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

ब्रसेल्स स्थित नाटो हेडक्वार्टर में बहस इस बात की हो रही है कि यदि अमेरिका ने ख़र्च वहन करने से अपने पैर खींच लिये तो कहीं ऐसा न हो कि दफ्तर में ही ताला लग जाए। इसका संकेत डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के साथ ही मिल गया था कि रूस विरोधी दुनिया के इस सबसे बड़े सैन्य गठबंधन के बुरे दिन आने वाले हैं। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ वर्षों में नाटो बिखर ही जाए।

व्हाइट हाउस इस पर चुप्पी यों भी साध लेता था क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में जितने बड़े ऑपरेशन हुए, उसमें अमेरिका ने अपने हित साधने के लिए नाटो का इस्तेमाल किया। ख़ासकर, रूस को निपटाने के वास्ते नाटो सबसे बड़ा ‘फायरवॉल’ बना हुआ था। ट्रंप आरंभ से इस सैन्य-कूटनीतिक फायरवॉल के विरुद्ध थे। 14 अप्रैल 2०16 को न्यूयार्क के ब्रुकलिन में डेमोक्रेटिक डिबेट के दौरान ट्रंप ने यह सवाल उठाया था कि अमेरिका क्यों नाटो के कुल ख़र्च का बहत्तर फ़ीसदी ढोये।

मगर, ट्रंप जैसे राष्ट्रपति के पास इसका जवाब नहीं है कि कोरियन वार से कोसोवो और कुवैत तक, इराक से लेकर सीरिया, अफगानिस्तान तक और यूक्रेन समेत पूर्वी यूरोप के देशों, अफ्रीका तक अमेरिका ने जो चौधराहट दिखाई है, उसकी बड़ी कीमत छोटे सदस्य देश क्यों चुकायें?

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