आरबीआई की सख्ती बरकरार

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रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी कमिटी (एमपीसी) ने एक बार फिर ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। हालांकि सरकार की अपेक्षा थी कि इस बार ब्याज दरों में कटौती हो और वित्त मंत्री अरुण जेटली एमपीसी बैठक से ठीक पहले बाकायदा इसे जाहिर भी कर चुके थे। वित्त वर्ष 2०15-16 के 8 फीसदी के मुकाबले 2०16-17 में जीडीपी वृद्धि दर 7.1 फीसदी रही। इस गिरावट को थामने के लिए सरकार ब्याज दरों में जल्द से जल्द कटौती को जरूरी मान रही है। लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल की सोच इससे अलग है।

पॉलिसी की घोषणा के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने साफ किया कि कमजोर क्रेडिट ग्रोथ की समस्या कर्ज सस्ता करने से नहीं हल होगी। इसके लिए बैंकों का बट्टा खाता कम करने का कोई जतन किया जाना चाहिए।
दूसरे शब्दों में कहें तो बैंकों का रीकैपिटलाइजेशन यानी सरकार की ओर से उन्हें पूंजी मुहैया कराना ही उन्हें ज्यादा कर्ज बांटने की ओर ले जाएगा। महंगाई फिलहाल काबू में लग रही है, लेकिन रिजर्व बैंक अभी इस मोर्चे पर भी सतर्क रहना रहना चाहता है।

लगता है, मानसून और जीएसटी का असर देखने के बाद ही वह इस बारे में किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगा। इस लिहाज से रिजर्व बैंक का ब्याज दरें ज्यों की त्यों रखने का फैसला तर्कसंगत है। अलबत्ता रुख नरम करने के संकेत के रूप में उसने एसएलआर (स्टैचुटरी लिच्ििडटी रेशो) में आधा फीसदी की कटौती की है। एसएलआर बैंकों की कुल जमाराशि का वह हिस्सा है, जिसका उपयोग उन्हें सरकारी बॉन्ड खरीदने में करना होता है। (आरएनएस)

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