रोकथाम की सामाजिक पहल जरूरी

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अनूप भटनागर
करीब पांच साल पहले दिल्ली में हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्याकांड के बाद पुणे में एक साफ्टवेयर इंजीनियर से सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में दोषियों को मौत की सजा सुनाये जाने के बावजूद विभिन्न राज्यों में इस तरह के वहशी अपराध का सिलसिला बदस्तूर जारी है। निर्भया कांड के बाद तो सरकार ने बलात्कार के अपराध से संबंधित कानूनी प्रावधानों को बेहद कठोर कर दिया था लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के प्रति यौन हिंसा करने वालों पर इसका कोई असर नहीं हुआ है।

सवाल यह है कि कानून में कठोर प्रावधान के बावजूद इस तरह की वहशियाना हरकतों के सिलसिले पर काबू कैसे पाया जाये। सामूहिक बलात्कार की बढ़ती घटनाओं से यह तो साफ हो गया है कि कठोर कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है। पुलिस और प्रशासन ही नहीं, राजनीतिक दलों और समाज सुधारकों को इस चुनौती से निपटने के लिये दूसरे उपाय खोजने पर अब और अधिक गंभीरता से मंथन करना होगा। यही नहीं, आरोपियों और समाज विरोधी तत्वों के मन में पुलिस का भय बिठाना आवश्यक है।

कुछ समय पहले तक दिल्ली को बलात्कार की राजधानी के तमगे से नवाजा जा रहा था लेकिन अब तो ऐसा लग रहा है कि इस स्थान को हथियाने के लिये उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में होड़ लगी हुई है। सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि बलात्कार की घटनाओं के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने की बजाय इन्हें किसी न किसी तरह से दबाने का प्रयास हो रहा है लेकिन जनता और पीडि़त परिवारों में आ रही जागरूकता अब पुलिस की संवेदनशीलता को कठघरे में खड़ा करने लगी है।

यह समझ से परे है कि जब तक इस तरह के जघन्य अपराध के बारे में पुलिस के आला अधिकारियों से गुहार नहीं लगायी जाती तब तक स्थानीय स्तर पर मामला दर्ज करने से लेकर आरोपियों की धरपकड़ में तेजी ही नहीं आती।

निर्भया मामले में उच्चतम न्यायालय ने चार दोषियों की मौत की सजा बहाल रखते हुए कहा था कि इनका वहशियाना अपराध ‘विरले में भी विरलतमÓ की श्रेणी में आता है। इसलिए उनके साथ किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती। यह फैसला आने के बाद इतना तो निश्चित हो गया है कि इस तरह के अपराधों में अदालत किसी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगी।

इससे पहले भी फरवरी, 2०15 में रोहतक में एक मानसिक महिला रोगी से सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या की घटना सुर्खियों में थी। इस मामले में करीब एक दर्जन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।

इस फैसले के चंद दिनों के भीतर हरियाणा के रोहतक जिले में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या ने निर्भया कांड की याद ताजा कर दी। कहते हैं कि गिरफ्तार आरोपियों में से एक महिला से शादी करना चाहता था। इस निर्णय के चंद दिन बाद ही पुणे में एक साफ्टवेयर महिला इंजीनियर से अक्तूबर, 2००9 में सामूहिक बलात्कार और उसकी हत्या के जुर्म में तीन दोषियों को मौत की सजा सुनायी गयी।

इन फैसलों के आने के बावजूद उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में 26 मई को एक नाबालिग लड़की से सामूहिक बलात्कार करने और उसकी वीडियो फिल्म बनाये जाने की सनसनीखेज घटना सामने आयी है। इसी तरह की घटना यमुना एक्सप्रेस वे पर भी होने के आरोप हैं।

सामूहिक बलात्कार के आरोप में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री रह चुके गायत्री प्रजापति के खिलाफ उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर ही प्राथमिकी दर्ज हो सकी और विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें गिरफ्तार किया जा सका। इसी तरह, शाहजहांपुर में मां-बेटी से कथित सामूहिक बलात्कार के मामले में समाजवादी पार्टी के ही एक अन्य नेता को अपनी विवादास्पद टिप्पणी के कारण उच्चतम न्यायालय में माफी मांगनी पड़ी।

इन घटनाओं को अगर राजनीति से परे रखा जाये तो भी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि सामूहिक बलात्कार की घटनाओं के मामले में 2०14 और 2०15 में उत्तर प्रदेश पहले और राजस्थान दूसरे स्थान पर था जबकि हरियाणा चौथे स्थान पर।

बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के अपराधों में तेजी से हो रही वृद्धि से यही पता चलता है कि हमारे समाज में सब कुछ ठीक नहीं है। पुलिस और प्रशासन के साथ ही समाजसेवियों, राजनीतिक दलों और महिला संगठनों को ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने तथा इस तरह की मानसिकता वाले लोगों की पहचान कर उन्हें पूरी तरह समाज से अलग-थलग करने की संभावनाओं पर भी विचार करने की आवश्यकता है।

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