भारत की नई उड़ान

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की यह नई कामयाबी चंद्रयान और मंगलयान से बढ़कर नहीं तो उनसे रत्ती भर कम भी नहीं है। सोमवार की शाम इसरो ने भारी-भरकम सैटलाइट लॉन्च वीइकल जीएसएलवी मार्क-3 को प्रक्षेपित किया। यह भारत का अब तक का सबसे वजनी रॉकेट है, जिसका भार करीब 64० टन है। अपनी पहली उड़ान में यह रॉकेट 3136 किलोग्राम के सैटलाइट को उसकी कक्षा में पहुंचाएगा।

जीएसएलवी मार्क-3 न सिर्फ भारी देसी उपग्रहों के प्रक्षेपण में देश के पैसे बचाएगा, बल्कि अन्य देशों के चार टन श्रेणी वाले उपग्रहों को प्रक्षेपित करने का महंगा बाजार भी खोलेगा। इस रॉकेट की सबसे बड़ी बात है कि यह पूरी तरह भारत में बना है। हल्के उपग्रहों के प्रक्षेपण में इसरो का पहले से ही पूरी दुनिया पर राज चल रहा है, अब भारी उपग्रह छोडऩे में भी अपनी काबिलियत दिखा देने के बाद हमारे लिए कुछ भी साबित करना जरूरी नहीं रह गया है।

दरअसल, दूरसंचार के दिन दूने रात चौगुने विकास ने दुनिया के अंतरिक्ष बाजार में 35०० किलोग्राम से अधिक वजन वाले उपग्रहों की मांग अचानक बढ़ा दी है। जीएसएलवी मार्क-3 के कामकाज शुरू करने के बाद हम संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण में आत्मनिर्भर हो जाएंगे और विदेशी ग्राहकों को लुभाने में भी सफल होंगे। इस स्थूलकाय रॉकेट की ऊंचाई किसी 13 मंजिला इमारत के बराबर है और यह ऊंची कक्षाओं में चार टन तक के उपग्रह लॉन्च कर सकता है।

इस रॉकेट में स्वदेशी तकनीक से तैयार हुआ क्रायोजेनिक इंजन लगा है, जिसमें ईंधन के तौर पर द्रव ऑक्सिजन और हाइड्रोजन का इस्तेमाल होता है। इस प्रॉजेक्ट को पूरा करने में 15 साल लगे हैं। आगे यह रॉकेट भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस में ले जाने का काम करेगा। दुनिया में उपग्रह प्रक्षेपण का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और भारत इसमें तेजी से जगह बना रहा है, लेकिन हमें अपनी गति और तेज करने की जरूरत है। अभी इस बाजार में कमाई के लिहाज से अमेरिका की हिस्सेदारी 41 फीसद है जबकि भारत का हिस्सा बमुश्किल चार प्रतिशत तक पहुंचता है। चीन साल में कम से कम 2० प्रक्षेपण करता है। इस दृष्टि से भी हमें अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

बहरहाल, इसरो ने पिछले कुछ वर्षों की उपलब्धियों से यह साबित किया है कि अगर काम करने का माहौल और स्वतंत्रता मिले तो हमारे संस्थान किसी भी मामले में विश्व स्तरीय प्रदर्शन कर सकते हैं। लेकिन इसरो की हर कामयाबी यह सवाल भी उठाती है कि भारत के बाकी वैज्ञानिक संस्थान इस स्तर का प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहे?

सैटलाइटों और अंतरिक्ष यानों में भारत अमेरिका, रूस और चीन को टक्कर दे रहा है, लेकिन परमाणु ऊर्जा से लेकर हाई-टेक सैनिक साजो-सामान तक के मामले में हम विदेश पर निर्भर हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए।(आरएनएस)

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