भारत की घेराबंदी का सिल्क रूट

0
127

जी. पार्थसारथी
लगता है चीन को जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सार्वभौमिकता को चुनौती देने की आदत-सी पड़ गई है। चीन के अन्य भड़काऊ कृत्यों में अरुणाचल प्रदेश में विशिष्ट व्यक्तियों की यात्रा पर एतराज जताने जैसे काम भी हैं। जबकि खुद वह अपने यहां पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए कश्मीर और गिलगित-बालटिस्तान से आने वाले नेताओं का राजकीय स्वागत करता है।

इसके अलावा चीन हमारे साथ लगते पड़ोसी देशों, जैसे कि श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश के दीगर भारत विरोधी राजनीतिक दलों, नेताओं और तत्वों की मदद करता है ताकि इन मुल्कों के संबंध हमारे देश से बिगड़वा सके। हालांकि अब भारत ने चीन की इस ‘सामरिक घेराबंदी’ वाली नीति पर नपी-तुली प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है।

दलाईलामा की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को भारत सरकार ने चीन के तमाम एतराजों को खारिज करते हुए प्रोत्साहित करके न केवल इस सूबे पर अपनी सार्वभौमिकता को सिद्ध किया बल्कि दलाईलामा ने भी बौद्ध धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखने वाले त्वांग की यात्रा विशेषतौर पर चुनकर की है। मगर भारत-चीन संबंधों में 51 बिलियन डॉलर की लागत से बनने वाली चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना (सीपीईसी) ने काफी खटास बढ़ा दी है।

चूंकि चीन की वन बेल्ट-वन-रूट नामक इस अंतर एशियाई-यूरोप परियोजना का एक हिस्सा भारत से हथियाए गए गिलगित-बालटिस्तान के इलाके से होकर गुजरेगा, इसलिए इसमें शामिल होने का अर्थ होता हमारे अधिकारों को चुनौती।

सागरीय और जमीनी घेराबंदी के जरिए भारत को नाथने हेतु चीन-पाकिस्तान की जुगलबंदी वाली इस परियोजना से भारत के सुरक्षा हितों को जो खतरा बनने वाला है, उसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। इस योजना के अंतर्गत चीन के शिनजियांग प्रांत के कश्गर स्थित चाइना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के क्षेत्रीय मुख्यालय से पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना के हेड-क्वार्टर तक फाइबर ऑप्टिक लिंक-केबल बिछाना भी शामिल है।

सीपीईसी के माध्यम से चीन और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच संपर्क-समर्था और ज्यादा बढ़ जाएगी। चीन ने पाकिस्तान को बड़ी संख्या में युद्धपोत और पनडुब्बियां देने का वादा भी किया है। अरब-खाड़ी देशों से समुद्र के जरिए भारत आने वाले तेल मार्ग की राह में ग्वादर बंदरगाह एक महत्वपूर्ण और सामरिक स्थान रखती है। चीन का ‘नौवहनीय सिल्क मार्ग’, जो ‘वन बेल्ट-वन रूट’ परियोजना का समुद्रीय संस्करण है, उसका रास्ता हिंद महासागर में भारत के दक्षिणी तटों के पास से गुजरते हुए मलाक्का की खाड़ी से होता हुआ अदन की खाड़ी तक उलीका गया है।

स्पष्ट है, चीन की मंशा है कि भारत की चारों तरफ से सागरीय घेराबंदी कर दी जाए। इस सिलसिले में म्यांमार का क्योप्कू, श्रीलंका में हम्बनतोता, पाकिस्तान में ग्वादर, अफ्रीकी महाद्वीप में कीनिया का मोम्बासा और अदन की खाड़ी में दिजबोती बंदरगाह इस शृंखला-रेखा के बिंदु हैं।

चीन की यह पैंतरेबाजी तब और भी स्पष्ट हो जाती है, जब श्रीलंका में उसने पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे को अपने हाथों में लेकर आर्थिक रूप से अत्यंत अव्यावहारिक परियोजना शुरू करवा दी थी और इसके हश्र में श्रीलंका कर्ज के मकडज़ाल में बुरी तरह फंस गया था। अब अपने ऊपर चढ़े इस उधार को चुकता न कर पाने की एवज में श्रीलंका को हम्बनतोता बंदरगाह और साथ लगता औद्योगिक क्षेत्र चीन को सौंपना पड़ रहा है।

आखिरकार भारत ने इस मामले पर अपना सार्वजनिक बयान दिया था, जिसमें कहा गया है कि यह परियोजना भारत की क्षेत्रीय सार्वभौमिकता का उल्लंघन करती है बल्कि उन मुल्कों को आगाह किया है कि जिनके क्षेत्र से होकर यह सड़क गुजरेगी, कैसे इसके निर्माण हेतु लिए गए कर्ज के बोझ के तले वे भी श्रीलंका की भांति दिवालिया होने के कगार पर पहुंच जाएंगे।

बीजिंग में शिखर सम्मेलन से पहले हमारे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि यह परियोजना ‘स्थापित अंतर्राष्ट्रीय नियमों’ पर खरी नहीं उतरती और इसके सिद्धांतों में निहित आर्थिक आजादी, पारदर्शिता और समानता का उल्लंघन करती है। इस परियोजना में चीन आर्थिक जिम्मेवारी के मानकों को लेकर ईमानदार नहीं है क्योंकि इसमें योजनागत-कर्ज-प्राप्तकर्ता देश को आर्थिक घाटा होने पर सारा बोझ उठाने से बचाने हेतु कोई प्रावधान नहीं रखा गया है।

भारत ने इस बिंदु को भी उभारा है कि इस संपर्क मार्ग परियोजना के सदस्य देशों को चाहिए कि वे निर्माण की तकनीक और कौशल हस्तांतरण करने और उनकी सार्वभौमिकता एवं क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखने की शर्त भी करार में शामिल करवाएं।इस शिखर सम्मेलन में केवल 2० देशों ने शिरकत की, उसमें भी ज्यादा संख्या दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्वी एशिया के मुल्कों की थी। इसमें मौजूद मुख्य वैश्विक नेताओं में केवल राष्ट्रपति पुतिन ही थे, क्योंकि कुछ मामलों में रूस की निर्भरता अब चीन पर होने लगी है।

रूसी विशेषज्ञों ने इस सड़क की वजह से रूस की सार्वभौमिकता को लेकर बनने वाली चुनौती पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं क्योंकि यूरेशिया के जिस हिस्से से यह गुजरेगी, उस पर ऐतिहासिक रूप से अपना ‘पिछला आंगन’ बताकर रूस अपना दावा करता आया है। इस सम्मेलन में सिंगापुर के प्रधानमंत्री को इस वजह से नहीं बुलाया गया क्योंकि उन्होंने कहा था कि दक्षिण-चीन सागर के सीमा विवादों को अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सुलझाया जाना चाहिए।

LEAVE A REPLY