ट्रंप धमाका

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अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग करके दुनिया को चौंका दिया है। इस समझौते की आलोचना वह शुरू से करते आ रहे थे, लेकिन कई और मामलों में उन्होंने अपना रवैया नरम किया है, लिहाजा सबको उम्मीद थी कि शायद वह अपना यह रुख भी बदल दें। अभी हाल में जी-7 के सम्मेलन में, जब ट्रंप ने पेरिस समझौते पर सभी सदस्य देशों से अलग राग अलापा और इस पर बाद में अपना फैसला सुनाने की बात कही, तब भी लगा कि वह समझौते में कुछ और सौदेबाजी करना चाहते हैं। पर ये आशाएं धरी की धरी रह गईं।

आज की तारीख में उपद्रवग्रस्त सीरिया और आर्थिक नाकेबंदी के शिकार निकारागुआ की तरह अमेरिका भी पेरिस समझौते से बाहर खड़ा है। ट्रंप ने अपने इस निर्णय के पीछे ऐसे तर्क दिए हैं जो शायद ही किसी के गले उतरें। उन्होंने कहा है कि इस समझौते में भारत और चीन जैसे च्प्रदूषणकारी देशोंज् को अनुचित लाभ मिला है। इस समझौते के तहत दोनों देश अगले कुछ वर्षों में कोयले से संचालित बिजली संयंत्रों को दोगुना कर लेंगे और भारत को अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने के लिए अरबों डॉलर मिलेंगे।

ट्रंप को भय है कि इन उपायों से चीन को अमेरिका पर वित्तीय बढ़त हासिल हो जाएगी। वे शायद इस बात से अनजान हैं, या इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि भारत और चीन दोनों ही संधि के तहत निर्धारित लक्ष्यों को लेकर गंभीर हैं। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार दोनों ने साल 2०15 के समझौते में कार्बन उत्सर्जन कम करने का जो लक्ष्य तय किया था, उससे आगे चल रहे हैं। रिपोर्ट में उम्मीद जताई गई है कि भारत निर्धारित लक्ष्य से आठ साल पहले, यानी 2०22 तक ही अपनी 4० प्रतिशत बिजली गैर-पारंपरिक स्रोतों से पैदा करने लगेगा।

ट्रंप चाहे जो भी बहाना बनाएं, दुनिया जानती है कि संधि से बाहर होकर वह किसे खुश करना चाहते हैं। उनके इस घोषणा का अमेरिका के उन इलाकों में सबसे ज्यादा स्वागत हुआ है, जहां कोयले की खदानें हैं और जहां इनके बंद होने से अनेक लोग बेरोजगार हो रहे थे। इस तरह च्अमेरिका फर्स्टज् का अपना चुनावी वादा पूरा करके ट्रंप ने अपने देश के एक तबके का दिल जीत लिया है। लेकिन इस क्रम में उन्होंने अपनी अंतरराष्ट्रीय हैसियत के साथ समझौता भी कर लिया है।

जलवायु परिवर्तन पर जारी अंतरराष्ट्रीय मुहिम की कमान छोड़ देने से सभी वैश्विक मंचों पर अमेरिका की भूमिका प्रभावित होगी। उस पर भरोसा कम होने के कारण उसके समर्थक देशों में नए सिरे से लामबंदी हो सकती है। जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल के बयान में इसके संकेत मिल चुके हैं। खुद अमेरिका में भी ट्रंप का विरोध हो रहा है। देखें, इस तूफान का सामना वह कैसे करते हैं। (आरएनएस)

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