बदस्तूर जारी वहशत-दहशत का खेल

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कृष्ण प्रताप सिंह
आम नागरिकों के जान-माल की रक्षा व अमन-चैन के लिहाज से उत्तर प्रदेश एक बार फिर ‘प्रश्न-प्रदेश’ में बदलता दिखायी देने लगा है। विश्लेषकों में कोई इसे इतिहास का दोहराना कह रहा है और कोई सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा गत विधानसभा चुनाव में किये गये वायदों के ऊंटों का पहाड़ के नीचे आ जाना। लेकिन पीडि़त प्रदेशवासी तख्त व ताज बदलने में पूरे जोशोखरोश से सहभागी होने के बावजूद अभी तक किसी सुरक्षा का एहसास नहीं कर पाये हैं।

कहां तो शपथ लेते ही गुंडाराज को जड़-मूल से खत्म कर देने का वायदा था और कहां योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार के दो महीने बीत जाने के बाद भी वहशत ने फिर से सुरसा बनकर सिद्ध कर दिया है कि न उसे सरकार चलाने वाली पार्टी बदलने से कोई फर्क पड़ा है और न उसकी सरकार के हर हाल में कानून का राज स्थापित करने के ढपोरशंखी ऐलानों से।

वहशत का पुराना इतिहास दोहराया जा रहा है तो उससे जुड़े वे सरकारी कर्मकांड भी दोहराये ही जा रहे हैं, जिन पर निर्भर करती पिछली सरकार सत्ता से बाहर हो गयी। प्रदेश तो क्या, अभी देश के लोगों को भी भूला नहीं होगा कि किस तरह पिछली सरकार के मंत्री मोहम्मद आजम खां को हाईवे पर हुए बुलंदशहर-1 को राजनीतिक साजिश बताने को लेकर चौतरफा आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था।

लेकिन अब योगी सरकार भी अपनी काहिली स्वीकार करने के बजाय विपक्ष की कथित साजिशों को ही जिम्मेदार ठहरा रही है। ऐसे में किसी को तो पूछना चाहिए कि उसके रहते विपक्ष साजिशें रचने में सफल हुआ जा रहा है तो आखिर वह किस मर्ज की दवा है और उससे पार पाने के लिए उसे और कैसे जनादेश की दरकार है? इस संदर्भ में मुख्यमंत्री का यह कहना ठीक हो सकता था कि अभी कानून व्यवस्था सुधारने के लिए उन्हें और समय दिया जाना चाहिए।

यह भी कि ‘पन्द्रह साल की गन्दगी’ साफ करने में वक्त तो लगेगा ही। विपक्ष भी अभी गुंडाराज जारी रहने को लेकर उनकी उतनी आलोचना नहीं कर रहा, जितनी इस बात की कि उनके सत्ता संभालते ही उनके ‘अपनों’ का मंसूबा इतना बढ़ गया है कि वे हर जगह कानून अपने हाथ में लेने को उतारू हैं। सपा के राज में उसके एक खास जाति के कार्यकर्ताओं पर थाने चलाने का आरोप लगता था तो अब ‘योगी राज’ में उनकी जगह एक खास रंग के गमछाधारियों ने ले ली है, जो ‘चित भी उनकी, पट भी उनकी’ में यकीन करते हैं।

ऐसे में प्रदेश को जिस सवाल का तुरंत जवाब चाहिए, वह दरअसल यह है कि विधानसभा चुनाव में धर्म व जाति की दीवारें ढहाकर जीत हासिल करने के दावे के बाद ऐसा क्या हो गया कि भाजपा के प्रदेश की सत्ता संभालते ही वे दीवारें और मजबूत दिखने लगीं और मामला जाति युद्ध तक पहुंच गया? क्यों उच्च वर्गों व जातियों के एक बड़े हिस्से का जातीय अभिमान इतना बढ़ गया है कि वे दलितों के हक की लड़ाई को और कठिन बनाने पर उतारू हैं?

वह समरसता कहां चली गयी, जिसका चुनावों के दौरान ढोल पीटा जाता है? मई महीने की शुरुआत में महाराणा प्रताप जयंती पर निकाली गई जिस शोभायात्रा के दौरान सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में राजपूतों व दलितों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ और जिसके बाद से ही जारी आगजनी व तोडफ़ोड़ आदि की आंच अभी तक कम नहीं हो रही, उसके लिए कौन से तत्व जिम्मेदार हैं? वे कौन थे, जिन्होंने इस गांव से शोभायात्रा निकालने की मनाही के बावजूद वैसा किया।

बाद में दलितों ने महापंचायत करने की कोशिश की और उसकी मंजूरी नहीं मिलने पर सड़कों पर उतरकर बेकाबू हो गये तो उसकी जिम्मेदारी किस पर आती है? अगर उस अनाम भीम आर्मी पर, जिसे शह देने को लेकर बसपा व भाजपा एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं तो उसके पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां, पानी व खाद कहां से मिल रहा है? क्यों ऐसा हुआ है कि अनेक क्षुब्ध दलित जंतर-मंतर तक प्रदर्शन कर आये हैं?

दु:ख की बात है कि न इन सवालों के जवाब दिये जा रहे हैं और न पुलिस व प्रशासन को ऐसी घटनाओं व स्थितियों से निपटने को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश या संदेश। ऐसे में कानून का राज भला कैसे आ सकता है? पिछली सरकार पर जातीय आधार पर नौकरशाही को बांटने का आरोप लगाने वाला यह राज भी कार्यकुशल के बजाय मनपसंद अधिकारियों पर ही निर्भर कर रहा है।

पुलिस व प्रशासन की क्षमता पर इसका असर इस रूप में पड़ रहा है कि वे लखनऊ में आईएएस अफसर की हत्या तक का मामला नहीं सुलझा पा रहे और उसकी जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी है। प्रदेश सरकार द्वारा सहारनपुर में तैनाती के लिए केन्द्र से और बल मांगने व केन्द्र द्वारा वैसी जातीय हिंसा के देश के और हिस्सों में विस्तार के डर से उससे रिपोर्ट तलब करने से भी योगी सरकार की अक्षमता ही प्रदर्शित होती है।

इस अक्षमता से पार पाने के लिए उसे अपने-पराये का भेद करने का रास्ता छोड़कर वस्तुस्थिति का तर्कसंगत सोच के साथ सामना करना होगा।

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