तैश में होश खोती पीढ़ी के दंश

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शंभूनाथ शुक्ल
दिल्ली में कुछ विश्वविद्यालयी छात्रों ने एक ई-रिक्शा वाले को पीट-पीटकर मार डाला। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसने इन युवकों को रिक्शा स्टैंड पर पेशाब करने से मना किया था। उसने कहा था कि भाई साहब आप बगल में बने सुलभ शौचालय में चले जाओ क्योंकि इस जगह बैठकर हम अपना लंच करते हैं।

अगर आपके पास पैसे नहीं हों तो मैं दे दूंगा। मालूम हो कि सुलभ शौचालय में यूरिनल प्रयोग करने के दो रुपये और टॉयलेट के पांच रुपये लगते हैं। यह अमानवीय हरकत उस दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब की है, जिसकी प्राचीनता व गरिमा की लोगबाग दुहाई देते हैं। चूंकि मामला मेट्रो स्टेशन के निकट का है, इसलिए उन युवकों की तस्वीरें डिजिटल कैमरे में कैद हो गईं।

पुलिस को उम्मीद है कि जल्दी ही वे छात्र पकड़े जाएंगे। मगर यहां प्रश्न उनके पकड़े जाने का नहीं है बल्कि यह है कि आखिर हमारे युवकों का पेशेंस इतनी जल्दी कैसे समाप्त हो जाता है। क्या वजह है कि समाज का अंकुश अब समाप्त होने लगा है। एक सभ्य समाज में लोगों का दबाव ही इतना इकबाल पैदा करता है कि लोग अपराध करने से डरते हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें पुलिस का खौफ रहता है।

इसी तरह रामपुर में दो लड़कियों के साथ 14 लड़कों ने जिस तरह दरिंदगी की और उसे यू-ट्यूब पर डालकर वायरल कर दिया। इन सब में अधिकांश कम उम्र के हैं। इसका साफ मतलब है कि घर पर संस्कारों की शिक्षा देना बंद कर दिया गया है। आधुनिक समाज में अपने बच्चों को देखने, उसे समझने की कूवत ही नहीं रही है। न मां को वक्त है, न पिता को फुर्सत और दादा-दादी या नाना-नानी की साझा संस्कृति ही खत्म हो चली है।

एक बच्चे ने तो अपने साथी बच्चे को क्लास में धमकाया कि तू जाने नहीं, मैं अमुक जाति का हूं, मार कर डाल दूंगा। जिस समाज में गर्व करने के लिए जातियों का रोल हो जाएगा, वहां क्या बचेगा? तब ऐसे समाज में बच्चे एकांतिक होते चले जाएंगे और टीवी पर चलने वाले धारावाहिकों तथा क्राइम शो देखकर उनके अंदर क्राइम का जज्बा ही बढ़ता है पर अभी तक न तो पुलिस ने और न किसी सामाजिक संगठन ने इन शो को बंद करने की अपील की है।

एक कहावत है कि अगर लड़कियों को पढ़ाया गया तो कालांतर में उनके बच्चे भी पढ़ जाएंगे। इसके पीछे आशय यह था कि एक पढ़ी-लिखी मां अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालेगी। मगर पढ़ी-लिखी मां नौकरी करने लगती है और उसके पास फुर्सत ही नहीं होती कि वह बच्चों में संस्कार डाले। और पिता के पास अपने बच्चों को समझाने की न तो कूवत होती है, न उसके पास इतना धैर्य। ऐसे बच्चों से भला क्या उम्मीद की जा सकती है। वे जैसा देखते हैं वैसे ही बनेंगे।

दिल्ली के ई-रिक्शा वाले रवींद्र की अभी पिछले वर्ष ही शादी हुई थी और उसकी पत्नी गर्भवती है। घर पर पत्नी के अलावा चार भाई और पिता हैं तथा सबके लिए कमाने वाला एक वही सदस्य था। पिता दिल्ली पुलिस से रिटायर्ड कांस्टेबल हैं। अब उसकी मृत्यु के बाद घर वालों को समझ नहीं आ रहा कि अपने कमाऊ बेटे के जाने के बाद क्या करें।

सवाल यह उठता है कि जब किसी का बच्चा ऐसी कोई हरकत करते पकड़ा जाता है अथवा छेडख़़ानी में उसे लोग देख लेते हैं तो क्या उसे रोकते हैं तो जवाब है कतई नहीं। उलटे यह कह दिया जाता है कि लड़के हैं गलतियां हो ही जाती हैं। एक बड़े राष्ट्रीय नेता ने अपनी पार्टी के शोहदों का यही कहकर बचाव किया था।

यानी परोक्ष रूप से वे यह कह रहे हैं कि लड़कियों को घर पर कैद कर रखो। जो समाज स्वयं इतना कायर हो गया हो कि दिनदहाड़े दो लड़कियों को सरेआम छेड़ा जा रहा हो और वे बचाव के लिए अनवरत लड़ रही हों। वहां पर उस घटना को देख रहे लोग आंखें मूंद लें तो क्या किया जा सकता है।

जब तक ऐसी हरकतों की सार्वजनिक भर्त्सना नहीं होगी और ऐसे लोगों को समाज में अकेला नहीं छोड़ दिया जाएगा तब तक चाहे कितना दंड उन्हें दिया जाए, हालात सुधरने वाले नहीं। नेताओं को ऊटपटांग बयान देने से बाज आना चाहिए वरना आने वाले दिनों में लड़कियों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा।

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