एक दूजे के लिए

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बर्लिन यात्रा के बाद भारत और जर्मनी के रिश्तों में और गर्मजोशी आई है। मोदी ने कहा कि भारत और जर्मनी एक-दूसरे के लिए बने हुए हैं, तो जर्मनी की चांसलर मर्केल ने भी भारत को भरोसेमंद साझेदार बताया। जर्मनी को यूरोपियन यूनियन का पावर हाउस कहा जाता है।

वर्तमान संदर्भ में भारत-जर्मनी मैत्री के मायने बहुत बदल गए हैं। अभी तक दोनों एक-दूसरे को कारोबारी साझेदार ही मान कर चल रहे थे, पर अब दोनों के लिए एक-दूसरे का कूटनीतिक महत्व भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीति और जलवायु परिवर्तन संबंधी नजरिये से जर्मनी खफा है। ऊपर से ब्रिटेन ने भी यूरोपीय संघ से अलग राह अपना ली है। इसलिए जर्मनी को अब नए साझेदारों की तलाश है।

पिछले दिनों जी-7 सम्मेलन के बाद मर्केल ने साफ कहा था कि जर्मनी ब्रेग्जिट और ट्रंप के जमाने में ब्रिटेन और अमेरिका जैसे पारंपरिक सहयोगियों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता। लगता है, मर्केल अपने पुराने दोस्त अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरह व्यापार और सहयोग के मुद्दे पर ‘लुक ईस्ट’ की रणनीति अपनाने जा रही हैं।

इस अवसर का हमें पूरा लाभ उठाना चाहिए। जर्मनी जुलाई में जी-2० सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। भारत और चीन दोनों ही जी-2० के सदस्य देश हैं। ऐसे में भारत के लिए बेहतर होगा कि वह जर्मनी को अपने नजदीक रखे। यह सही है कि जर्मनी और चीन का व्यापारिक संबंध काफी गहरा है, लेकिन चीन की राजनीतिक व्यवस्था यूरोपीय मिजाज के अनुकूल नहीं है।

बहरहाल मोदी की यात्रा के मौके पर साइबर राजनीति, विकास पहलकदमियों, सतत शहरी विकास, क्लस्टर प्रबंधकों का सतत विकास एवं कौशल विकास, डिजिटलीकरण के क्षेत्र में सहयोग, रेल सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग, व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा और भारत-जर्मन केंद्र पर लगातार सहयोग को लेकर एक संयुक्त उद्देश्य घोषणा-पत्र सहित कुल 12 सहमति-पत्रों पर दस्तखत किए गए।

मोदी और मर्केल के बीच हुई वार्ता में भारत और जर्मनी ने आतंकवाद को बढ़ावा और समर्थन देने वालों और उसे धन मुहैया कराने वालों के खिलाफ ‘कड़े कदम’ उठाने का इरादा जाहिर किया। भारत के लिए जर्मनी ईयू में सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है।

यहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले देशों में जर्मनी का स्थान सातवां है, लेकिन यह भी सच है कि जर्मनी के निर्यात और आयात साझीदारों की लिस्ट में भारत टॉप-2० में शामिल नहीं है। जर्मन कंपनियों ने यूपीए सरकार के दौरान करप्शन की शिकायत की थी।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी हालात बहुत बदले नहीं हैं। उम्मीद है कि अब कारोबार के आड़े आ रही तमाम बाधाएं दूर होंगी और जर्मन कंपनियां भारत के विकास में ज्यादा योगदान कर सकेंगी।

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