जीवन से जुड़े जीएम सरसों के सवाल

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जयश्री सेनगुप्त
सरसों की जेनेटिकली मॉडीफाइड किस्म यानी डीएमएच-11 मस्टर्ड को दिल्ली यूनिवर्सिटी के साइंसदानों ने विकसित किया है। अब इसे उगाने की इजाजत सर्वोच्च न्यायालय ने भी दे दी है। उम्मीद है सब कुछ ठीक रहा तो आगामी रबी के मौसम में व्यावसायिक तौर पर इसकी फसल बोने का काम शुरू हो जाएगा।

अरुणा रोड्रिग्स जो एक बायो-टेक्नोलॉजिस्ट के अलावा पर्यावरण-बचाओ कार्यकर्ता भी हैं, ने पिछले साल जीएम मस्टर्ड की व्यावसायिक बुवाई पर रोक लगाने के लिए अदालत में केस दायर किया था।

हाल ही में जीईएसी (जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी) ने जीएम मस्टर्ड की व्यावसायिक खेती को निरापद घोषित करते हुए इसे पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के लिए भेज दिया था। भारत में कई सालों से जीएम फसलों को लेकर संशय छाए रहे हैं। आपको याद होगा कि वर्ष 2०1० में बीटी बैंगन की खेती के लिए हरी झंडी दे दी गई थी, लेकिन बाद में इस पर रोक लगा दी गई।

लोग या तो जीएम खाद्य पदार्थों के पक्ष में हैं या फिर विरोध में रहे हैं। केंद्र सरकार को तुरंत निर्णय लेने की जरूरत है क्योंकि कृषि क्षेत्र में उत्पादन संबंधी अनेक समस्याएं हैं, खासकर मौसम में बदलाव और तेजी से बढ़ते शहरीकरण की वजह से गिरता कृषि उत्पादन। तेजी से बढ़ती खाद्य पदार्थों की मांग को लेकर कई लोगों का मानना है कि जीएम फसलों में इस समस्या का समाधान छिपा है।

जीएम खाद्यान्न कोई भावुकता या राजनीतिक मुद्दा नहीं है और इस पर पूरी तरह वैज्ञानिक नजरिये से सोच-विचार करने की जरूरत है। कोई भी इस बात पर राजी होगा कि परीक्षण के दौरान जीएम भोजन खाने से चूहों में ट्यूमर (ग्रंथियां) और कैंसर जनित रोगों के लक्षण पाए गए हैं।

जीएम फसलों के समर्थक इसे निरापद बताते हैं। संघ की आर्थिक इकाई स्वदेशी जागरण मंच तो जीएम बीजों का विरोध करती ही आयी है, इसके अतिरिक्त भारतीय किसान यूनियन आदि भी इसकी राह में बड़ी रुकावट बनी हुई है। अनेक देशों के अनुभव के आधार पर जीएम भोजन को इनसान के उपयोग के लिए सुरक्षित बताया गया है। अमेरिका और कनाडा में उगने वाली सारी मक्की और सोयाबीन जीएम फसलें ही हैं। हालांकि यूरोपियन यूनियन के कई देशों ने जीएम फसलों पर प्रतिबंध लगा रखा है।

वैज्ञानिकों की राय है कि इनसान अपने मुताबिक चुन-चुनकर फसलें उगाता आया है और हजारों सालों से पौधों के जीनोम को अपनी इच्छा अनुसार परिवर्तित करता आया है। पिछले लगभग 6० सालों से वैज्ञानिक पौधों के डीएनए में म्यूटेशन तकनीक के अंतर्गत रेडियशन और रसायनों के माध्यम से बदलाव ला रहे हैं। इसके चलते गेहूं, धान, मूंगफली और नाशपाती की विकसित की गई नयी नस्लें अब बाजार में मिलना आम बात है।

जीएम तकनीक वैज्ञानिकों को किसी पौधे के जीनोम को एकल-जीन या मिश्रित-जीन वाले पौधे में संकरित करने की समर्था प्रदान करती है। यहां तक कि यह काम बैक्टीरिया, वायरस या किसी प्राणी के जीन के जरिए भी किया जा सकता है। यह भी हो सकता है कि इस प्रक्रिया का कोई दीर्घकालीन असर हो, जिसका पता आने वाले समय में सामने आए।

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पडऩे वाले असर को एक तरफ रखकर यदि हम जीएम फसलों का संपूर्ण आकलन करें तो याद रखना होगा चूंकि यह मामला इनसान की खाद्य शृंखला से जुड़ा है, इसलिए अत्यंत सावधानी बरतने की जरूरत है।

अरुणा रोड्रिग्स के मुताबिक जीएम फसल अपने पास-पड़ोस स्थित पौधों को भी संदूषित कर देती हैं, जिससे जैव-विविधता को खतरा पैदा हो जाता है। वे जीईएसी की पारदर्शिता को लेकर आलोचना यह कहकर करती हैं कि इसने जीएम सरसों पर जैव-सुरक्षा को लेकर पूरे तथ्य अपनी वेबसाइट पर जानबूझकर नहीं डाले हैं और ऐसा करके केंद्रीय सूचना आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है।

जीएम सरसों के समर्थक कहते हैं कि चूंकि इसका संवर्धन पूरी तरह से भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने किया है, इसलिए यह कहना कि इसमें अतंर्राष्ट्रीय कपंनी मोंसेंटो की तर्ज पर रॉयल्टी का खेल है तो यह बात सिरे से गलत है। वर्ष 2०16 में मोंसेंटो ने भारत में अगली पीढ़ी के जीएम कॉटन के बीज के वितरण की अनुमति को लेकर दी अपनी अर्जी वापिस ले ली थी।

बॉलार्ड-1 नामक बीटी कॉटन पहली ऐसी जीएम फसल थी जिसकी अनुमति भारत सरकार ने वर्ष 2००2 में दी थी, इसके बाद वर्ष 2००6 में बॉलार्ड-2 नामक अगली पीढ़ी का बीटी-कॉटन बीज भारत में उतारा गया था। बीटी कॉटन की वजह से देश में कपास के उत्पादन में प्रति एकड़ के हिसाब गुणात्मक वृद्धि हुई है और इसी अनुपात में निर्यात भी बढ़ा है।

इससे रॉयल्टी के रूप में मोंसेंटो ने भारी मुनाफा भी कमाया था, लेकिन जब सामने आया कि इससे उगी कपास में पिंक बॉलवॉर्म नामक कीड़ा लग रहा है तो सरकार ने मोंसेंटो की रॉयल्टी को कम करते हुए बीटी कॉटन के बीज की ऊपरी कीमत तय करने का निर्देश दिया था।

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