आ गया मॉनसून

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मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुरूप मॉनसून ने मंगलवार को केरल और नॉर्थ-ईस्ट में एक साथ दस्तक दे दी। अमूमन यह 1 जून को केरल के तटवर्ती इलाकों को छूता है। उम्मीद की जा रही है कि जून के पहले हफ्ते में यह देश के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों को अपने प्रभाव में ले लेगा।

मौसम विभाग ने इस बार पिछले 5० वर्षों की औसत बारिश की 96 फीसदी बरसात होने की भविष्यवाणी की है। 2०14-15 और 2०15-16 के दो लगातार सूखों के बाद इस साल की संभावित अच्छी बारिश खेती के लिए ही नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है। इस खबर के बल पर ही पिछले कुछ दिनों से सेंसेक्स भी चढ़ता नजर आ रहा है।

जब सब इस खुशी में झूमते दिख रहे हों तब कड़वी बातों का जिक्र करना भला किसे अच्छा लगेगा। लेकिन सच्चाई को भुलाना किसी समस्या का हल नहीं है, इसलिए हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि फीसदी में मॉनसून का हिसाब बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता। अहम सवाल यह है कि इस 96 फीसदी बारिश का देश के अलग-अलग हिस्सों में कैसा बंटवारा होता है।

अगर किसी इलाके में बहुत ज्यादा बारिश हो जाए और किसी अन्य इलाके में बूंद भी न पड़े तो औसत अच्छा ही बना रहेगा, लेकिन देश का एक हिस्सा सूखे का तो दूसरा बाढ़ का संकट झेलेगा। गौरतलब है कि पिछले साल मौसम विभाग ने औसत से अच्छी बारिश की भविष्यवाणी की थी, जिसे बाद में संशोधित करके औसत बारिश का रूप दिया गया था। लेकिन इस संतोषजनक खबर के बावजूद तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों में सूखे जैसे हालात बने रहे।

रहा सवाल अच्छे मॉनसून और अच्छी खेती के रिश्तों का, तो इसमें संदेह का कोई कारण नहीं, लेकिन अच्छी खेती का मतलब यह नहीं कि इससे किसानों को राहत मिल जाएगी। इसके बहुत सारे उदाहरण मौजूदा हैं कि अच्छी खेती का फायदा किसानों तक अपने आप नहीं पहुंच जाता।

किसानों की बेहतर आमदनी सुनिश्चित करने के लिए बाजार तक उनकी पहुंच और लाभदायक मूल्य सुनिश्चित करना जरूरी है। उम्मीद करें कि अच्छे मॉनसून पर हर्ष-उल्लास के इस माहौल में सरकार किसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद रखेगी।(आरएनएस)

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