आतंक से निजात दिलाने वाला दिलेर

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साधवी खोसला
पंजाब के पूर्व डीजीपी के.पी.एस. गिल एक ऐसी शख्सियत थे, जिनकी प्रशंसा और आलोचना लोगों द्वारा एक जैसी गति से की जाती है। सच यह है कि उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। वे एक ऐसी कद्दावर हस्ती थे जो पंजाब के उथल-पुथल के दौर में भी निर्भीकता से सिर उठाकर खड़े रहे थे। उन्हें यकीन था कि पंजाब में आतंकवाद का दौर आईंदा कभी नहीं आ सकता।

यह वर्ष 2०15 के शुरुआत की बात है जब पंजाब में बढ़ते नशे की लत पर अपने अनुसंधान के दौरान मैंने एक किताब लिखने का मन बनाया। इसी सिलसिले में मेरी मुलाकात कंवरपाल सिंह गिल से हो गई। मैंने उन्हें एक टेक्सट मैसेज भेजा। उनकी ओर से तुरंत जवाब आया। वे खुश थे कि कोई उनसे उस प्रांत के बारे में बात करना चाहता है।

1988-95 के बीच पंजाब में चले आतंकवाद को उन्होंने कुचला था। अपनी जानकारी को लेकर वे बहुत ईमानदार थे क्योंकि उनके पास पंजाब में नशे को लेकर तब नवीनतम आंकड़े नहीं थे लेकिन जो कुछ भी वे बता सकते थे, उन्होंने साझा किया।

केपीएस गिल पूरी तरह से बारीकियों पर नजर रखने वाले इनसान थे। उनका नजरिया था कि पंजाब नशे की गिरफ्त से निकल सकता है बशर्ते इस ध्येय को पाने की खातिर सख्त कदम उठाए जाएं। इस बारे में उन्होंने राजीव गांधी के साथ अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया था कि कैसे पंजाब के आतंकियों से निपटने में प्रधानमंत्री ने उन्हें खुला हाथ दे रखा था।

वे राजीव गांधी की बहुत इज्जत किया करते थे और अकसर कहा करते थे कि जिस दिन उनकी मौत हुई, उसी रोज कांग्रेस ने अपना सब कुछ गंवा दिया था। वे इस बात को लेकर भी चिंतित हुआ करते थे कि एक दल विशेष की वजह से देश एक खास दिशा में खिंचा चला जा रहा है। उनके नजरिए में किसी भी लोकतंत्र में केवल किसी एक दल का प्रचंड बहुमत होना अच्छा संकेत नहीं होता।

कुछ दिन पहले उनकी हालत बहुत खराब थी। छत्तीसगढ़ में हुए ताजा नक्सली हमले के बारे में उन्हें रंज था कि इस विषय में सरकार उनका सहयोग और सलाह क्यों नहीं लेती। हाल ही में पंजाब में कांग्रेस की जीत से वे इस बात को लेकर खुश थे कि पंजाब ‘सुरक्षित हाथ’ में जा रहा है। कैप्टन अमरेंद्र सिंह की जीत को लेकर वे पहले से ही काफी आश्वस्त थे।

वे बताया करते थे कि कैसे कई मौकों पर उन्होंने प्रकाश सिंह बादल समेत अनेक राजनीतिक हस्तियों के साथ अपने अनुभव साझा किए हैं। यह भी कि वर्ष 2००2 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया था। वे किसी के खिलाफ नकारात्मक भावना नहीं रखते थे। यहां तक कि अपने सबसे कटु आलोचकों के विरुद्ध भी नहीं।

किसी की बेजा निंदा करना उनके स्वभाव में ही नहीं था। पंजाब को लेकर उनका नजरिया सदा आशावादी रहा था। वे इस बात को लेकर सौ फीसदी आश्वस्त थे कि पंजाब में आतंकवाद का दौर अब दुबारा नहीं पनप सकता। 2०16 में पठानकोट और 2०15 में गुरदासपुर की घटनाओं को लेकर वे अपने पहले वाले उपरोक्त वक्तव्य पर कायम रहते थे।

वे अत्यधिक ईमानदार थे। यही कारण था कि अपनी ओर से किसी से कुछ मांगने नहीं गए। पिछले कई सालों से वे वृंदावन में अपना काफी समय बिताया करते थे जहां वे सामाजिक भलाई के कई कामों में लिप्त थे। वे अकसर कहा करते थे, ‘सबसे पहले मैं एक भारतीय हूं।’

मुलाकातों के लिए वे समय के बहुत पाबंद थे। हजारों किताबों वाली अपनी लाइब्रेरी में वह काफी समय व्यतीत करते थे। 56 इंच की विशाल स्क्रीन पर वह खबरें ज्यादा देखा करते थे। वे मुझे ‘पंजाब की शेरनी’ कहकर पुकारने लगे थे। ‘द एनेमी विदिन’ नामक किताब के माध्यम से वह चाहते थे कि पंजाब के लोग यहां की असलियत से वाकिफ हों। सभी धार्मिक ग्रथों की उन्हें काफी जानकारी थी, चाहे यह गुरु ग्रंथ साहिब हों, श्रीमद् भगवत गीता या फिर रामायण।

केपीएस गिल को वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। इस बारे में कम ही लोगों ने सोचा होगा कि उन्हें एक ऐसा पंजाब मिला, जिसमें उनके सामने इस सूबे को विद्रोह से बचाने हेतु और कोई अन्य रास्ता था ही नहीं। क्यों भारत सरकार इस इनसान को वह सम्मान देने में विफल रही, जिसके वह पात्र थे।

वे कहा करते थे, ‘मुझे इस बात का रंज है कि मैं कश्मीर में काम नहीं कर पाया और यह चीज मुझे तब तक सालती रहेगी जब तक मैं जिंदा हूं।’ वह ‘भारत रत्न’ दिए जाने के लिए पूरी तरह योग्य हैं और उन्हें यह हक मिलना ही चाहिए। इस शेरदिल नायक को मेरी दिली श्रद्धांजलि।

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