बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं

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सूबे की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। जिन सरकारी अस्पतालों पर आम जनता के स्वास्थ्य का जिम्मा है उन अस्पतालों में न तो पर्याप्त डाक्टर है और न अच्छे उपकरण। जीवन रक्षक दवाओं अभाव इन अस्पतालों में हमेशा बना रहता है। जो भी संसाधन और डाक्टर उपलब्ध् है वह भी अपनी ड्यूटी कैसे कर रहे हैं बीते कल सीएम त्रिवेन्द्र रावत द्वारा किये गये औचक निरीक्षण से साफ हो गया है।

राजधानी का दून अस्पताल जिस पर बड़ी संख्या में बीमार निर्भर रहते है उसकी व्यवस्थाओं को देख कर यही लगता है कि वह किसी दोयम दर्जे का जिला अस्पताल है। यहाँ बड़ी से बड़ी एमरजैंसी में एक्स रे और सिटी स्कैन जैसी छोटी जांच तक संभव नहीं होती है। मुख्यमंत्री ने कल ड्यूटी से गायब मिले दो डाक्टरों और लापरवाही से इंजेक्शन लगाने वाली एक नर्स को सस्पेंड कर दिया। वास्तव में दून अस्पताल में मरीजों का इलाज नहीं होता है बस जांच ही संभव है डाक्टरों द्वारा यहाँ आने वाले मरीजों को हायर सेंटर रेैफर करने का काम ही किया जाता है। डाक्टरों का ड्यूटी में लापरवाही बरतना तो जैसे आम बात है।

डाक्टरों की कमी तो है ही लेकिन जो डाक्टर हैं भी वह कितनी ईमानदारी से अपना काम करते है और कितनी देर अपनी सीट पर बैठते है? यह बड़ा सवाल है। सरकार से पगार लेने वाले इन डाक्टरों का पूरा ध्यान अपनी निजी प्रैक्टिस पर ही रहता है। 16 सालों में कोई भी सरकार इन डाक्टरों को पहाड़ी क्षेत्रों में सेवाएं देने पर विवश नहीं कर सकी है।

जब भी कोई सरकार इन्हे पहाड़ों पर भेजने का प्रयास करती है तो स्थानान्तरण होते ही डाक्टर लम्बी छुट्टी पर चले जाते है या फिर नौकरी छोड़कर चलते बनते है। राजधानी दून की तो बात अलग लेकिन राज्य के पर्वतीय जनपदों में तो स्वास्थ्य सेवाओं का हाल इतना खराब है कि वहाँ किसी गम्भीर बीमारी का इलाज संभव ही नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार पर भले ही सरकार द्वारा बड़ा बजट खर्च किया जाता है लेकिन नतीजा शुन्य ही रहता है।

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