जमानत का अधिकार

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देश की जेलों में फैसले का इंतजार करते विचाराधीन कैदियों की विशाल संख्या लंबे समय से चिंता का कारण बनी हुई है। समय-समय पर उपयुक्त मंचों से यह चिंता जाहिर भी होती रही है। मगर इस संख्या को कम करने का कोई ठोस उपाय नहीं हो पाया है। ऐसे में अगर लॉ कमिशन इस बारे में कोई पहल करता है तो इसे वक्त की जरूरत ही कहा जाएगा।

खबरों से संकेत मिलता है कि लॉ कमिशन ने सरकार को भेजी गई अपनी सिफारिशों में जमानत को आसान बनाने पर खास ध्यान दिया है। इसके मुताबिक सात साल तक की सजा के प्रावधान वाले मामलों में आरोपी अगर सजा की अवधि का एक तिहाई हिस्सा या ढाई साल जेल में काट चुका है तो उसे जमानत दे दी जानी चाहिए। ऐसे ही सात साल से ऊपर की सजा के प्रावधान वाले ऐसे मामलों में, जिनमें मृत्य दंड अपेक्षित नहीं है, आरोपी अगर सजा की अवधि का आधा हिस्सा जेल में गुजार चुका है तो उसे बेल दे दी जानी चाहिए।

इसके अलावा भी कई सुझाव लॉ कमिशन ने अपनी फेहरिस्त में शामिल किए हैं। जैसे यह कि ट्रायल कोर्ट में किसी आरोपी की जमानत की अर्जी पेश किए जाने के एक हफ्ते के अंदर उस पर फैसला हो जाना चाहिए। लॉ कमिशन के मुताबिक हाईकोर्टों को इस संबंध में आवश्यक कानूनी प्रावधान बनाकर इसे अनिवार्य कर देना चाहिए। ऐसे सुझावों पर न्यायिक हलकों में पहले भी काफी विचार-विमर्श हो चुका है। विचाराधीन कैदियों की समस्या लंबे समय से देश की न्याय व्यवस्था की कुशलता पर सवालिया निशान लगाए हुए है।

ऐसे कैदियों की संख्या भी अच्छी-खासी है जो अदालत से जमानत पा जाने के बावजूद जेलों से बाहर नहीं आ पा रहे, क्योंकि अपने लिए जमानतदार जुटाना उनके बूते की बात नहीं है। लॉ कमिशन ही नहीं, इंसाफ के तकाजों को समझने वाला कोई भी व्यक्ति कहेगा कि किसी शख्स की गरीबी को उसके जेल में पड़े रहने का कारण नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन ऐसी समस्याएं सिर्फ सिफारिशों से हल नहीं होतीं। जरूरी है कि सरकार इन सिफारिशों की आत्मा तक पहुंचे और जल्द से जल्द इन पर अमल सुनिश्चित करे।

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