ईरान पर ट्रंप के निशाने के निहितार्थ

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पुष्परंजन
ईरानियों को लगता है कि सऊदी अरब से लेकर इस्राइल की यात्रा के दौरान ट्रंप के दिमाग़ में कोई खुराफात चल रही थी, जिसके ख़तरनाक नतीज़े आने वाले दिनों में शायद मध्य-पूर्व के देशों को देखने को मिलें। नवंबर 2०16 में ट्रंप के शब्दों को याद कीजिए-‘अमेरिका में सऊदी अरब से तेल की एक बूंद तक नहीं आने दूंगा। 9/11 हमले के पीछे सऊदी अरबिया ही था।

‘ छह महीने के भीतर ट्रंप का ग़ायब हो चुका ग़ुस्सा कूटनीति के गलियारे में प्रहसन का विषय बनकर रह गया है। अब सब कुछ अमेरिका के पूर्ववर्ती राजनेताओं द्वारा तय लकीर पर चलना शुरू हो गया है। ख़ासकर मध्य-पूर्व के संदर्भ में।

इस्लामी दुनिया के चौधरी सऊदी अरब को ललकारने वाले ट्रंप, जब 2० मई को रेड कार्पेट स्वागत के वास्ते किंग खालिद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सपरिवार उतरे, तब लोग इसके लिए तैयार थे कि मिडिल ईस्ट में मनोरंजन का नया दौर अब शुरू होने वाला है। इसे ‘मनोरंजन’ ही कहना उचित होगा, जो कई दशकों से जारी है।

जो भी अमेरिकी शासन प्रमुख इस इलाके में आता है, आतंकवाद हटाने, अरब वर्ल्ड को एकजुट होने, ईरान को सुन्नियों और शांति का शत्रु घोषित करने, फिलीस्तीन समस्या को मिलजुल कर सुलझाने जैसे बयानों की झड़ी लगाता है और देह झाड़कर वापस व्हाइट हाउस चल देता है। ऐसी हरक़तों से बजाय तनाव में आने के, उनका लुत्फ उठाना ही सेहत के वास्ते सही है।

ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि ट्रंप की मध्य-पूर्व नीति उनके दामाद जरेद कुशनर के दम पर चल रही है। ट्रंप ने 9 जनवरी 2०17 को जरेद कुशनर को बहैसियत ‘सीनियर एडवाइजर’, सिफऱ् एक ही काबिलियत पर नियुक्त किया कि वह उनकी बेटी इवांका के पति हैं। जरेद कुशनर रूढि़वादी यहूदी खानदान के वारिस हैं, जिनका अमेरिका में रियल इस्टेट कारोबार है, साथ में ‘न्यूयार्क आब्जर्वरÓ जैसे अखबार के पब्लिशर भी हैं।

जरेद कुशनर से शादी के बाद इवांका ने भी यहूदी धर्म स्वीकार कर लिया था। पार्स टुडे की टिप्पणी दिलचस्प है, ‘अमेरिकी राष्ट्रपति ने सऊदी अरब में आहूत अरब-इस्लामी-अमेरिकी शिखर सम्मेलन में भाग तो लिया, मगर उन्होंने वहां किसी महत्वपूर्ण इस्लामी स्थान का दौरा नहीं किया।

इसके विपरीत डोनाल्ड ट्रंप और उनके परिवार के सदस्यों ने अपने दौरे के पहले ही दिन यहूदियों के लिए धार्मिक महत्व वाली ‘दीवारे नुदबा’ का दौरा किया। अमेरिकी समाचार एजेंसी एबीसी ने भी ‘दीवारे नुदबा’ के दौरे का ब्योरा दिया है। सीएनएन के मुताबिक, ‘इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ट्रंप को 15० साल पुरानी बाइबिल भेंट की थी।’

सोमवार को तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर ट्रंप के भव्य स्वागत से संदेश गया है कि इस्राइल एक बार फिर से मध्य-पूर्व की कूटनीति का केंद्र बनेगा। ट्रंप, मंगलवार को फिलीस्तीनी नेता महमूद अब्बास से मिले, उसके उपरांत वेटिकन, ब्रसेल्स और जी-7 की बैठक में हिस्सेदारी लेकर वापस व्हाइट हाउस चले गये।

ट्रंप लौट तो गये, मगर अपने पीछे विवादों का बाइस अपने बयानों के ज़रिये छोड़ गये हैं। डोनाल्ड ट्रंप बयानों के बम फोड़कर लाख दर्शाते रहें कि इस्लामी गठजोड़ और उसके द्वारा पोसे जाने वाले आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेंगे, लेकिन जिस तरह से 55 मुसलमान देशों के शासन प्रमुखों के समक्ष उनकी भाषणबाज़ी हुई, उससे यह साफ हो गया कि इनके तेवर अब ढीले पड़ रहे हैं।

यह बात तो दिख रही है कि ट्रंप ने अपनी झेंप मिटाने के वास्ते ईरान जैसा ‘बलि का बकरा’ ढूंढ लिया है। ट्रंप ने 55 अरब और मुसलमान देशों के नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान ही ऐसा देश है, जो लेबनान से लेकर इराक, यमन, फिलीस्तीन तक आतंकियों को प्रशिक्षित कर रहा है, और पूरे इलाके में हिंसा फैला रहा है।

ट्रंप ने ईरान को शेष विश्व से अलग-थलग करने का आह्वान किया। इसी मंच पर सऊदी किंग सलमान ने ईरान को आतंक का निर्यात करने वाला देश घोषित किया, और कहा कि आतंकवाद को फंडिंग करने वाले इस देश को हम चैन से रहने नहीं देंगे।

इससे एक बात तो साफ हो गई कि ट्रंप वही करेंगे, जो अमेरिका की इंडस्ट्री कह रही है, और जैसा इस्राइल चाह रहा है। इसमें शक की गुंजाइश ही नहीं है कि 9/11 के अतिवादियों को पैसे, हथियार और प्रशिक्षण में परोक्ष रूप से सऊदी अरब रहा है, लेकिन मिट्टी में मिला दिया गया अफग़ानिस्तान और इराक़ को।

सऊदी अरब के तेल, हथियार, रियल इस्टेट व अधोसंरचना उद्योग में जो अमेरिकी पैसा लगा है, उसे बर्बाद करने के पक्ष में व्हाइट हाउस तब भी नहीं था, जब 9/11 के ज़ख्म ताज़ा थे। अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक पर हमला करके दोनों देशों की ईंट से ईंट बजा दी थी। मगर, सऊदी अरब वहाबी चरमपंथी विचारधारा को पूरी दुनिया में फैला रहा है, यह चिंता सिफऱ् ट्रंप के चुनावी दौरों में ही गूंज कर रह गई।

ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जऱीफ ने ट्विट के ज़रिये कहा कि अभी-अभी चुनाव से फारिग हुए ईरान पर अमेरिका ने कूटनीतिक हमला किया है। यह विदेश नीति है या 48० बिलियन डॉलर के लिए सऊदी अरब का दोहन? दूसरी दफा ईरान के राष्ट्रपति बने हसन रूहानी के लिए ट्रंप की पश्चिम एशिया नीति भी एक चुनौती के रूप में रहेगी।

सऊदी अरब और इस्राइल के दौरे में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान से लग रहा है कि ईरान के प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम को लेकर व्हाइट हाउस से टकराव की स्थिति परवान चढ़ेगी।

ईरान ने ट्रंप के बयान को हस्तक्षेपपूर्ण, ईरानोफोबिया फैलाने वाला और उसके विरुद्ध युद्ध भड़काने वाला करार दिया है। ईरान इस समय दो लाख बैरल क्रूड आयल रोज़ाना निर्यात कर रहा है। राष्ट्रपति रूहानी ने कहा कि तेल आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भरता में तीस फीसदी कमी हम ला चुके हैं, उसे और कम करना है।

ईरान की इस रणनीति का असर तेल उत्पादक देशों का संगठन ‘ओपेक’ पर कितना पड़ता है, यह आने वाले दिनों के लिए समीक्षा का विषय होगा।

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