पहले सफाई हो दिमाग में

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संतोष उत्सुक
उन्होंने तो सीधे-सीधे कह दिया कि मैंने क्या लेना। शहर में लोग अभी भी कूड़ा यहां-वहां फेंक देते हैं। मैंने उनसे कहा था-चलो म्युनिसिपल कमेटी में शिकायत करते हैं। वैसे तो अकेले भी कहा जा सकता है, पर यह सोचकर कि एक अकेला दो ग्यारह होते हैं।

एक अन्य परिचित से साथ चलने को कहा तो उन्होंने मुझसे कहा-आप अपना कूड़ा सही तरह से ठिकाने लगाते हो न। मैंने कहा-हां। वे बोले-फिर मैंने क्या लेना और आपने भी क्या लेना। किसी को समझाने की कोशिश करोगे तो कहीं वो अपना कचरा आपके सर पर न बिखेर दे। याद रहे कूड़ा-कचरा भी कई किस्म का होता है। वक्त खराब चल रहा है, बचकर रहो।

शाम को पत्नी के साथ घूमने निकला तो उनकी नाक को भी अच्छा नहीं लगा। बोली-कैसे-कैसे लोग हैं, कचरा ड्रम में नहीं डालेंगे, आसपास फेंक कर चले जाएंगे। वो भी पोलिथीन बैग में भरकर। कितनी बदबू है। मैंने कहा-एक फोन कर दूं सैनिटरी इंस्पेक्टर को। वह मुझे घूरकर बोली-आपने क्या लेना। मैं तो वैसे ही कह रही थी।

एक परिचित धाकड़ पत्रकार मिल गए। कचरा पेटी के पास से गुजऱ रहे थे। हमने उनसे निवेदन किया कि देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है, देखिए लोग फिर भी नहीं मानते। आप इसकी खबर फोटो के साथ छापिए। बोले -कितनी बार छाप चुके हैं। मुंह ज़बानी भी कितनों को समझा चुके हैं। कोई मानता तो है नहीं तो हमें भी क्या लेना।

हमारे परिचित नहीं माने, पत्नी नहीं मानी। वस्तुत: अब कोई सहज मानने को तैयार नहीं होता। लगता है कूड़ा-कर्कट भी ऐसा होना चाहिए जो स्वत: चलकर कचरा पेटी में चला जाए। नगरपालिका के कर्मचारी सरकारी हैं, इसलिए थोड़ा काम करके ज्यादा थक जाते हैं। ठेकेदार कर्मचारियों को कम पैसे पर ज्यादा सफाई करवाना चाहता है।

सामाजिक संस्थाओं के कारनामे समझा देते हैं कि कोई भी अभियान रैलियों, विज्ञापनों, भाषणों, फोटोज, ख़बरों व मुख्य अतिथि के आधार पर सफल रहता है। अब तो खुश रहने का ज़माना है। हमारे नेताओं, नायकों, फिल्मी नायकों, ब्यूरोक्रेट्स, प्रवचकों व धर्माधीशों के निरंतर सद्व्यवहार से सहनशीलता हमारे रोम-रोम में रच गई है।

हमारे पड़ोस, मोहल्ले, शहर, जि़ला, राज्य या देश में कुछ यानी कुछ भी हो रहा हो; हमारा चुप, शांत रहने का सद्गुण हमेशा काम आता है। छोटे-मोटे कचरे से उद्वेलित होने की ज़रूरत नहीं है। (आरएनएस)

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