खून के छींटे

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ब्रिटेन के मैनचेस्टर शहर में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान हुए आतंकी हमले ने दुनिया को हिला कर रख दिया है। इस अमानवीय कार्रवाई की जितनी भी निंदा की जाए, कम है। समझ में नहीं आता कि मासूम बच्चों का खून बहाकर और नौजवानों की जिंदगी छीनकर कोई कौन सा मकसद हासिल करना चाहता है? एक आत्मघाती हमलावर ने यह विस्फोट उस वक्त किया, जब शहर के एक इनडोर स्टेडियम मैनचेस्टर एरिना में अमेरिकी युवा गायिका एरियाना ग्रैंड का पॉप कॉन्सर्ट समाप्त ही हुआ था।

विस्फोट में 22 लोगों की मौत हो गई और 59 लोग घायल हो गए। हमले में हमलावर की भी मौके पर ही मौत हो गई। लंदन में 7 जुलाई 2005 को हुए घातक आतंकी हमले के बाद यह ब्रिटेन में हुआ दूसरा सबसे बड़ा हमला है। अब से 12 साल पहले लंदन में सिलसिलेवार आतंकी आत्मघाती बम विस्फोट किए गए थे, जिनमें 52 लोगों की मौत हो गई थी और 770 से अधिक लोग घायल हुए थे। मैनचेस्टर विस्फोट में मारे जाने वालों में बच्चों और किशोरों की संख्या ज्यादा है क्योंकि 24 साल की एरियाना ग्रैंड उनके बीच बहुत लोकप्रिय हैं।

बताया जा रहा है कि वहां 60 स्कूली बच्चे बिना पैरेंट्स के आए थे। अभी उनमें से कुछ ने पास के एक होटल में शरण ली है, जबकि कई लापता हैं। जाहिर है, अनेक परिवारों की जिंदगी तहस-नहस हो गई है। कितनी भयानक बात है कि इस तबाही पर भी आईएसआईएस की तरफ से जश्न का वीडियो जारी हुआ है, हालांकि घटना की जिम्मेदारी इस आतंकी संगठन ने भी नहीं ली है।

अभी चंद रोज पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दुनिया से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की थी। संभव है, इस घटना को उस अपील की प्रतिक्रिया में अंजाम दिया गया हो। ब्रेग्जिट समर्थक मानते हैं कि खुली सीमा होने के कारण आतंकी यूरोप से ब्रिटेन चले आते हैं।

पर यह एक तरह का सरलीकरण है। आईएसआईएस की जड़ें बेशक सीरिया और इराक में हैं पर उसने सोशल मीडिया के जरिए दुनिया के हर कोने तक अपनी विचारधारा फैलाई है और युवाओं का ब्रेनवाश किया है। ऐसे में कौन कब कहां मरने-मारने पर उतारू हो जाए, कहना मुश्किल है।

ब्रिटेन में कुछ ही हफ्ते बाद आम चुनाव होने वाले हैं। क्या पता, यह हरकत उसे प्रभावित करने की कोशिश हो। आतंकवाद के खिलाफ पूरी दुनिया की एकजुटता का इससे बड़ा संदेश और क्या हो सकता है?

विडंबना यह है कि दुनिया के सभी बड़े मुल्क इससे लडऩे की बात तो करते हैं, पर इस मामले में भी फैसले अपना स्वार्थ देखकर ही करते हैं।

तमाम राष्ट्राध्यक्षों को समझना चाहिए कि आतंकी घटनाएं लोगों का हौसला पस्त कर रही हैं। अगर वे इसे रोकने की गंभीर कोशिश नहीं करेंगे तो उन्हें जबर्दस्त आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है।(आरएनएस)

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