ऐक्टिंग करने से मुझे कोई रोक नहीं सकता: सुशांत

0
101

भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे सफल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के रूप में ऐक्टर सुशांत सिंह राजपूत फिल्म दर फिल्म अलग-अलग किरदार निभाकर अपने फैन्स को चौंका रहे हैं। अपनी अगली फिल्म राब्ता में भी वह जुदा अंदाज में नजर आएंगे। पेश है उनके अब तक के सफरनामे पर उनसे हुई यह खास बातचीत :

जब आपने अपना हिट टीवी शो छोड़कर फिल्मों में किस्मत आजमाने का फैसला किया, तो किसी पल रिस्क का डर लगा था?
जब मैंने टीवी छोड़ा था, तो बहुत से लोग मुझे बोलते थे कि टीवी वाले फिल्मों में नहीं चलते। 25 साल पहले शाहरुख खान सक्सेसफुल हुआ था, लेकिन तब उसका शो हफ्ते में एक या दो दिन आता था। अभी हफ्ते में छह दिन शो आते हैं, फिर रिपीट आता है, तो इतने ज्यादा एक्सपोजर के बाद लोग कहने लगते हैं कि अरे, हम तो इसे फ्री में देखते थे, तो अब पैसे देकर क्यों देखें?

ये सारी कहानियां मैंने सुनी हैं, लेकिन सच यह है कि मैंने यह सब कभी सोचा नहीं था कि मैं एक दिन फिल्में करूंगा, या मैं इसके साथ काम करूंगा तो सक्सेसफुल होऊंगा। मुझे बस ऐक्टिंग करनी थी। पांच साल थिअटर किया, अपने आप टीवी शो मिल गया। फिर अपने आप फिल्म भी मिल गई। अपने आप ही फिल्में मिलती भी जा रही हैं।

अब आप किस्मत कहें या जो कहें, मैं बस काम रहा हूं। कल दो-तीन पिक्चरें नहीं चलीं, तो मेरा कोई गॉडफादर नहीं है, जो मुझे काम देता ही रहेगा। तो हो सकता है कि फिल्में छिन जाएं, तो शायद मैं फिर टीवी में आ जाऊं, या फिर थिअटर में वापस चला जाऊंगा, लेकिन ऐक्टिंग करने से मुझे कोई रोक नहीं सकता।

आप हर फिल्म में काफी अलग रोल कर रहे हैं। ज्यादातर ऐक्टर्स करियर की शुरुआत में इतना एक्सपेरिमेंट नहीं करते। इसकी क्या वजह है?
हर किसी की अपनी चॉइस होती है। मैं तो जानबूझकर ऐसे रोल चुनता हूं, जिनमें कुछ अलग करना होता है। इससे होता यह है कि शुक्रवार को पिक्चर रिलीज होने के बाद अच्छी चले या बुरी, लेकिन आप सोमवार तक ठीक हो जाते हो। मैंने यह एक्सपीरियंस किया है।

मैंने बहुत मेहनत की थी ब्योमकेश बख्शी के लिए। शुक्रवार को पिक्चर ने पैसे नहीं कमाए, लेकिन मंडे को मैं ठीक हो गया। फिर धोनी आई। उसने फ्राइडे को खूब पैसे कमाए और मंडे को मैं ठीक हो गया, इसलिए मैंने तय किया है कि दो-तीन दिन के लिए मैं अपने छह महीने नहीं बिगाड़ूंगा।

मुझे छह महीने मजा आना चाहिए और मजा तभी आता है, जब आप कुछ नया करते हैं। वैसे भी बहुत सारी चीजें ऐक्टर के हाथ में नहीं होतीं। ऐक्टर बस अपना काम ही ढंग से कर सकता है। मैं वही करता हूं कि अलग-अलग कैरक्टर चुनता हूं और पांच-छह महीने मजे से काम करता हूं।

अपने किरदारों के लिए तैयारी को लेकर भी आपकी काफी तारीफ होती है। सुना है राब्ता के लिए भी आपने बैंकॉक जाकर ट्रेनिंग ली।
दरअसल हम ऐक्टिंग को थोड़ा हल्के में लेते हैं, जबकि यह भी एक प्रफेशनल काम है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है कि मैं अपना काम ढंग से करता हूं। मेरे किरदार ही ऐसे होते हैं कि उसमें तैयारी जरूरी होती है। जैसे राब्ता में जो फ्लैशबैक वाला किरदार मैं कर रहा हूं, उसके बारे में मशहूर है कि वह बहुत खतरनाक योद्धा है। लोगों ने उसे देखा नहीं है, केवल उसकी कहानियां सुनी है। मेरे पास दो-तीन मिनट का फाइट सीन्स था यह सब दिखाने के लिए।

इसीलिए मैंने बैंकॉक जाकर ट्रेनिंग ली। फिर जो चीज निकलकर आई, तो लगा कि लोगों को मजा आएगा। मुझे मजा आता है नई चीज सीखने और करने में।
क्या इस नएपन की तलाश में ही आप इंजिनियरिंग छोड़कर ऐक्टिंग में आए?

मुझे तो यह बात बहुत पहले समझ आ गई थी कि ऐक्टिंग करना मुझे अच्छा लगता है। मेरे घरवालों ने बोला था कि इंजिनियरिंग करो, इसलिए मैं इंजिनियरिंग कर रहा था। मैं इंजिनियर लगभग-लगभग बन ही गया था, लेकिन मैंने देखा कि कॉलेज में मैं कम हंसता हूं और जब थिअटर करता हूं या स्टेज पर परफॉर्म करता हूं, तो बड़ा एक्साइटेड रहता हूं, ज्यादा हंसता हूं। इसीलिए मैंने तय किया मैं ऐक्टिंग करूंगा,

आपकी बातों से लगता है कि आप पैसों को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। दौलत और शोहरत क्या मायने रखती है?
मुझे यह पता है कि पैसे नहीं होते हैं, तो प्रॉब्लम होती है। मेरी लाइफ में पहले दौलत, शोहरत दोनों ही नहीं थे। हमारे घर में पैसों की हिसाब से फैसले हुआ करते थे। अगर मुझे विदेश जाकर किसी यूनिवर्सिटी में पढऩा है, तो वो पॉसिबल नहीं था क्योंकि चार साल में जितने पैसे चाहिए, वो नहीं थे।

इसलिए पैसा मायने रखता है, लेकिन उतना कि आपको सोचना नहीं पड़े कि खाने में क्या होगा या काम करने का मन नहीं है, तो दिक्कत नहीं होनी चाहिए। आपको उसके चलते अपने फैसले न बदलने पड़ें।

LEAVE A REPLY