अफ्रीकी विकास के सहयात्री

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पिछले दिनों अहमदाबाद में शुरू हुई अफ्रीकन डिवेलपमेंट बैंक की पांच दिवसीय सालाना बैठक कई वजहों से अहम मानी जा रही है। भारत 1983 से ही इस बैंक के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है लेकिन यह पहला मौका है जब इसकी सालाना बैठक भारत में हो रही है।

जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने उद्घाटन भाषण में संकेत भी दिया, भारत की विदेश और आर्थिक नीति में अफ्रीका की अहमियत हाल के बरसों में तेजी से बढ़ी है। इस महाद्वीप का कोई देश ऐसा नहीं है जहां भारतीय प्रधानमंत्री अपने इन तीन वर्षों के कार्यकाल में न गए हों। अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में भी पिछले डेढ़ दशकों में कई गुना इजाफा हुआ है।

मौजूदा हालात की बात करें तो चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रॉजेक्ट से अलग रहने के भारत के फैसले के बाद अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिक गई हैं कि इसके समानांतर अपनी अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए भारत क्या नया करता है। इस लिहाज से 54 अफ्रीकी देशों के नुमाइंदों की यह बैठक इनकी विकास यात्रा में भारत के योगदान के लिए नए रास्ते खोल सकती है।

इसी बैठक में भारत और जापान के संयुक्त एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर प्रस्ताव पर भी विचार-विमर्श होना है। इस बारे में अंतिम फैसला जापानी प्रधानमंत्री की इसी साल प्रस्तावित भारत यात्रा के दौरान होगा, लेकिन इस बैठक में जापान के उप वित्त मंत्री की भागीदारी बता रही है कि तैयारी कुछ बड़ा करने की है। बैठक में इस प्रस्ताव की बारीकियां भी तय होनी हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो अफ्रीका के विकास में एशिया की भूमिका और इसमें खास तौर पर भारत और जापान के तालमेल का खाका इस बैठक में तैयार होने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि जापान अफ्रीका में भारत का अकेला सहयोगी देश नहीं है।

भारत अलग-अलग अफ्रीकी देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि के साथ मिलकर काम आगे बढ़ा रहा है। यह नीति अभी तक की एकला चलो की नीति से थोड़ी अलग है। मोदी सरकार ने देश-दुनिया के बदलते समीकरणों के मद्देनजर अपनी यह नई रणनीति बनाई है ताकि अफ्रीका की विकास प्रक्रिया तो तेज हो ही, उसमें अपनी भूमिका को भी ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके। (आरएनएस)

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