आसमान से आग

0
115

अंडमान निकोबार में निर्धारित समय से तीन दिन पहले मानसून की फुहार को देश की जनता ने एक उम्मीद के रूप में महसूस किया। आशा जगी की देर-सवेर मानसून आ ही जायेगा। यूं तो केरल में मानसून की दस्तक एक जून तक विधिवत मानी जाती है।

कहना जल्दबाजी होगा कि वहां भी वह समय से पहले पहुंचेगा। बहरहाल, आसमानी आग से झुलस रहे उत्तरी भारत के राज्यों को अभी कुछ और समय गर्मी की तपिश झेलनी होगी। मानसून के इस एहसास को गर्म हवा का थपेड़ा तब महसूस हुआ जब नासा की रिपोर्ट आई कि अप्रैल का महीना पिछले 137 सालों में दूसरा सबसे गर्म महीना रहा। इस आंकड़े के बाद गर्मी के एहसास और तीखे हो गये। वैसे साल-दर-साल ऐसे आंकड़े सामने आ रहे हैं कि इतने सालों का रिकॉर्ड टूटा।

कुदरत के मिजाज में लगातार तल्खी है। हम न इसकी वजह को और न आने वाली पीढ़ी के भविष्य की चिंताओं को गंभीरता से ले रहे हैं। बल्कि हमने विकास के ऐसे मानक तैयार कर लिये हैं जो पर्यावरण के घोर विरोधी हैं। जो ऐसा वातावरण तैयार करते हैं कि गर्मी की तपिश साल-दर-साल और तीखी होगी। दुनिया के पर्यावरण संरक्षण यौद्धा दशकों से ग्लोबल वार्मिंग व धरती के तपने की चेतावनी दे रहे थे।

जनसंख्या विस्फोट के बाद आबादी के बोझ से चरमराती धरती अब सूरज की ऊष्मा सोख नहीं पा रही है। हमने जंगल काटे और कंक्रीट के जंगल उगाये। कंक्रीट के जंगलों में सूरज की तपिश सोखने की क्षमता धरती के मुकाबले न के बराबर है जो हमारे वातावरण को और गर्म बना देती है। पेड़ों के रहने से वातावरण सुहाना बना रहता था मगर शहरों में जंगल न के बराबर हैं। दूसरे हमने सुख-सुविधाओं की शृंखला में जो कार, एसी व फ्रिज जोड़े हैं, वे ग्रीन हाऊस गैसों का बड़ी मात्रा में उत्सर्जन करते हैं।

दरअसल हमारी जीवनशैली इतनी कृत्रिम हो चली है कि वह प्रकृति के कोसों दूर है। तापमान को संतुलित करने वाले नदी, नाले, तालाब, बावड़ी व झीलें सूख रही हैं। (आरएनएस)

LEAVE A REPLY