रोजगार का सवाल

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नौकरियों में कमी के आंकड़े मोदी सरकार की तीन साल की उपलब्धियों पर भारी पड़ रहे हैं। लेबर ब्यूरो की ओर से हाल ही में जारी हुई सर्वे रिपोर्ट बता रही है कि २०१५ में कुल १.५५ लाख नई नौकरियां मिलीं और २०१६ में २.३१ लाख।

लोकसभा चुनाव के दौरान हर साल दो करोड़ रोजगार वाले बीजेपी के वादे के सामने ये संख्याएं ऊंट के मुंह में जीरा ही लगती हैं। ऐसे में सरकार इसे गंभीरता से ले रही है तो यह स्वाभाविक है। कुछ समय पहले लाए गए अप्रेंटिस कानून को प्रभावी तौर पर लागू करने पर जोर दिया जा रहा है। इससे बड़ी संख्या में नौकरियां निकल सकती हैं।

प्रधानमंत्री के मुताबिक समस्या आंकड़े इक_ा करने और उसे पेश करने के तरीके में भी है। खबर है कि सरकार देश में जॉब्स की वास्तविक स्थिति का खाका पेश करने के लिए एक नया और बड़ा सिस्टम तैयार करना चाहती है। मौजूदा सिस्टम से जमीनी हकीकत सटीक ढंग से सामने नहीं आ रही है तो उसमें बदलाव किया ही जाना चाहिए। लेकिन रोजगार संबंधी आंकड़ों को लेकर सरकार के अंदर ही गंभीर असहमतियां दिखती रही हैं।

नीति आयोग से जुड़े कुछ लोगों की यह सुचिंतित राय है कि नौकरी या बंधा हुआ रोजगार कितने लोगों के पास है, यह खुद में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। उनके मुताबिक, ज्यादा अहम सवाल यह है कि लोगों के पास पैसा पहुंच रहा है या नहीं। अगर लोगों के पास पैसा पहुंच रहा है और उस पैसे को वे अपनी जरूरतों पर खर्च करने की स्थिति में हैं तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि संबंधित व्यक्ति किसी कंपनी में नियमित हाजिरी बनाकर महीने में एक बार वेतन पाता है, या मूंगफली के ठेले से रोज ५०० रुपये कमाकर घर लाता है?

इस प्रस्थापना के पीछे यह समझ काम कर रही है कि अगर पारंपरिक अर्थों में नौकरियां नहीं बढ़ रहीं या मौके-ब-मौके कम भी हो जा रही हैं तो गैर पारंपरिक रोजगार के बहुत सारे नए मौके भी सामने आ रहे हैं। भले ही यह बात सरकारी आंकड़ों में दर्ज न हो पाए, पर किसी वजह से नौकरी गंवाने वाला व्यक्ति भी ऐसे किसी न किसी मौके का फायदा उठाकर कमाई करना शुरू कर देता है, जिससे उसकी जीविका का संकट हल हो जाता है।

यह एक सुविचारित राय है और इसके औचित्य को चुनौती नहीं दी जा सकती। फिर भी यह सावधानी जरूर बरती जानी चाहिए कि लोगों की जीविका को लेकर अनिश्चितता की कोई गुंजाइश न छोड़ी जाए। जिस तरह संगठित-असंगठित रोजगार के आंकड़े जुटाए जाते हैं, उसी तरह यह भी पता लगाया जाए कि लोगों को जीविका का कोई वैकल्पिक जरिया मिल पा रहा है या नहीं।

मामले को अटकलों पर छोडऩा ठीक नहीं। सरकार के पास जीविका के सभी स्रोतों से जुड़े ऐक्शनेबल आंकड़े होने चाहिए, ताकि जरूरतमंद लोगों तक समय से मदद पहुंचाई जा सके।(आरएनएस)

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