बिजली का सपना

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देश में बिजली का उत्पादन बढ़ाने के लिए कैबिनेट ने भारी पानी से चलने वाले वाले दस न्यूक्लियर रिऐक्टर बनाने का फैसला लिया है। हर रिऐक्टर की क्षमता सात सौ मेगावाट होगी और इससे कुल मिलाकर सात हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा।

जापान सरकार के सहयोग से बनने और चलने वाले ये रिऐक्टर सन २०२४ तक बनकर तैयार होंगे। इस तरह देश में परमाणु बिजलीघरों की संख्या ३२ हो जाएगी। फिलवक्त देश में २२ न्यूक्लियर रिऐक्टर हैं जो ६७८० मेगावाट बिजली बनाते हैं। यह देश के कुल बिजली उत्पादन का ३.५ फीसद और खपत का १.३ फीसद है।

जापानी कंपनियों के साथ-साथ हल्के पानी से चलने वाले नई टेक्नॉलजी के रिऐक्टर बनाने वाली पश्चिमी देशों की कंपनियों को भी आकर्षित करने के लिए सरकार लायबिलिटी कानून में परिवर्तन करने की बात सोच रही है। अमेरिकी कंपनियों के साथ परमाणु बिजली बनाने का समझौता मुख्यत: दुर्घटना से जुड़ी देनदारियां बढऩे की वजह से ही जमीनी शक्ल नहीं ले पाया। सरकार का यह फैसला साहसिक कहा जाएगा, क्योंकि अभी तो लगभग सारे ही पश्चिमी देश न्यूक्लियर पावर से पीछा छुड़ाने में जुटे हैं।

फ्रांस के नए पर्यावरण मंत्री निकोलस हलोट ने २०२५ तक आधे ऐटमी प्लांट बंद करने की बात कही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि जापान के फुकुशीमा संयंत्र में हुई दुर्घटना के बाद से परमाणु बिजली को लेकर लोगों की आशंकाएं बहुत बढ़ गई हैं। परमाणु बिजली को शत प्रतिशत आशंकामुक्त बनाने का कोई तरीका नहीं है।

दुर्घटनाओं से निपटने के सबसे सुरक्षित उपाय कर लिए जाएं तो भी इनसे निकलने वाले कचरे को डंप करना खुद में एक बहुत बड़ी समस्या है। अभी यह देखना दिलचस्प है कि एक तरफ अमेरिका और यूरोपीय देश परमाणु बिजली से किनारा कर रहे हैं, दूसरी तरफ एशिया के दो सबसे बड़े देश चीन और भारत इसे जोर-शोर से आगे बढ़ाने में जुटे हैं। चीन सन २०२० तक अपने एटमी प्लांट्स से ३० हजार मेगावाट से भी ज्यादा बिजली उत्पादन की योजना लेकर चल रहा है।

भारत की हालिया घोषणा उत्साहवर्धक है, लेकिन इसका एक कमजोर पहलू यह है कि ईंधन और भारी पानी, दोनों बाहर से मंगाने की मजबूरी के चलते यह बिजली हमें काफी महंगी पड़ेगी। (आरएनएस)

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