कसौटी पर तीन साल का गुणगान

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एस. निहाल सिंह
भारतीय जनता पार्टी ने २०१९ के आम चुनाव को देखते हुए दो साल पहले ही अपना प्रचार शुरू कर दिया है। तीन साल पुरानी नरेंद्र मोदी सरकार को ऐतिहासिक उपलब्धियों वाली बताया जा रहा है और भक्तगण उन्हें देवता-तुल्य बताते नहीं अघाते।

हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार द्वारा आयोजित वार्ता में पूर्व संपादक और वर्तमान में विदेश राज्यमंत्री एम.जे. अकबर ने जिस तरह से पत्रकारिता वाले भाषा-कौशल का इस्तेमाल करते हुए मोदी का गुणगान किया, वह देखते ही बनता था। लेकिन यह तो महिमामंडन भरे प्रचार की शुरुआत भर है। यहां हैरान करने वाली बात यह है कि क्या केवल मोदी ही गरीब और बेसहारों के मसीहा हैं और दूसरे नेता नहीं?

अनेक सरकारी स्कीमों का श्रेय देकर मोदी की छवि को उभारा जा रहा है जैसे कि मोदी स्वच्छता के पक्षधर हैं। वैसे भी हमारे समाज में कहावत रही है कि ईश्वर के बाद साफ-सफाई आराधनीय है। इसके अलावा बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रम से उन्हें महिला-समर्थक बताया जा रहा है।

मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर मुहैया करवाने वाले मोदी को गरीब गृहिणियों का संरक्षक बताया जा रहा है। उन्हें वीआईपी संस्कृति के खिलाफ बताकर आम आदमी जैसा बताने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें सरकारी गाडिय़ों से लाल-बत्ती हटाने की मुहिम देखने को मिली है। यह बात अलग है कि ज्यादातर में इनकी जगह हूटर ने ले ली है।

इसी तरह २०१८ तक देश के सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का भी लक्ष्य उनकी प्रेरणा से लिया गया कहा जा रहा है। लेकिन यह बात मानने की है कि पिछली यूपीए सरकार की बनिस्पत मोदी साहसिक निर्णय लेते हैं, जिसकी एक बानगी पाकिस्तानी सीमा के अंदर घुसकर की गई सर्जिकल स्ट्राइक है।

भाजपा सरकार द्वारा उपलब्धियां गिनाने के बावजूद देश को आजादी दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और स्वतंत्रता उपरांत ज्यादातर सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पार्टी के योगदान का कहीं जिक्र तक नहीं किया जाता है जबकि इसके विपरीत भाजपा के ही अटल बिहारी वाजपेयी थे, जिन्होंने १९७१ में देश को जीत दिलवाने के लिए तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भरपूर सराहना की थी।

दिखाया यह जा रहा है कि घटाटोप अंधकार से निजात दिलवाने के लिए मोदी आसमान से उतरे हैं। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भाजपाई नेताओं और खासकर इसके मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका सवालों के घेरे में रही है। बिना किसी झिझक के मोदी ने कांग्रेस के तिलिस्मी नेता महात्मा गांधी को अपना प्रतीक बना लिया है।

मजे की बात यह है कि जवाहर लाल नेहरू को नजरअंदाज करते हुए उनके नंबर दो रहे सरदार वल्लभ भाई पटेल को भी अपना बताने लगे हैं। इसी तरह दलितों को लुभाने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी अपना लिया है।

आखिर तीन साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री की वास्तव में उपलब्धि क्या है? बेशक कई मुद्दों पर उन्होंने ठोस निर्णय लिए हैं। यहां यह याद रखना मौजूं होगा कि उन पर गठबंधन के सदस्यों को तुष्ट करने की मजबूरी नहीं है और तीन दशकों में ऐसा पहली मर्तबा है कि लोकसभा में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिला है।

प्रधानमंत्री का कहना है कि उन्होंने भ्रष्ट तंत्र की सफाई के उद्देश्य से नोटबंदी की है, लेकिन इस काम में कितनी सफलता मिली है, इस बात को लेकर आर्थिक विशेषज्ञ बंटे हुए हैं। इस कवायद में गरीबों को भारी परेशानी और भ्रामक स्थिति से गुजरना पड़ा, सो अलग से।

हां, यह जरूर है कि पड़ोसी देश, खासकर पाकिस्तान से मित्रता करने में मोदी के प्रयासों की श्लाघा की जानी चाहिए, भले ही इस काम में उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिली लेकिन अचानक लाहौर पहुंचकर नवाज शरीफ के घर जाकर उन्हें जन्मदिन की बधाई देकर दोस्ती बढ़ाने का प्रयास करना वाकई सराहनीय है।

भारत के लिए चीन एक सख्त पड़ोसी बना हुआ है और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट-वन रूट, जिसे बनाने में ज्यादा पैसा चीन का लगेगा, इस बाबत हुए सम्मेलन से भारत का अनुपस्थित रहना एक अच्छा निर्णय है क्योंकि इसका एक हिस्सा पाक के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरेगा।

भारत कैसा होना चाहिए, इसको लेकर आरएसएस का अपना सिंद्धात है, चूंकि ये दंतकथाओं और मिथकों पर टिके हैं, इसलिए अव्यावहारिक हैं। हालांकि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते मोदी ने आरएसएस की अनदेखी करना सीख लिया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी इस कारनामे को राष्ट्रीय स्तर पर नहीं दोहरा पाए क्योंकि हर कदम पर आरएसएस उनकी निगरानी कर रहा है और अनेक मौकों पर वह उनकी अनदेखी कर चुका है।

गौ रक्षक गुंडों पर पहले तो मोदी ने कुछ कहा नहीं था और जब बोले तो अगले ही दिन आरएसएस के दखल पर उन्हें अपने कहे शब्दों में सुधार करना पड़ा था। इसलिए मोदी का तीन वर्ष का शासनकाल विरोधाभासों से भरा है। जहां एक ओर वैश्विक स्तर की तकनीक को अपनाने और सुधार लाने की ललक है तो दूसरी तरफ पुरातन भारत की श्रेष्ठता का महिमामंडन करते हुए भारत के समूचे सिद्धांत को बदलकर इसे मध्ययुगीन बनाने वाले प्रयास हैं।

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