वायरस के साइड इफेक्ट

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सुरजीत सिंह
दुनिया में रेंसमवेयर वायरस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। कंप्यूटरों के भीतर घुसकर बैठा है, बदले में फिरौती मांग रहा है। लेकिन इंडिया में बाकी दुनिया की तरह हाहाकार नहीं मचा है। बचाव में आउटडेडेट सिक्योरिटी फीचर्स, गाइडलाइन के नाम पर लतीफेबाजी-सी हो रही है।

जहां-जहां कंप्यूटरों पर अटैक हुआ, वहां-वहां एकदम परम शांति-सी पसरी है, क्योंकि कर कुछ सकते नहीं। और जिन मसलों में कुछ कर नहीं सकते, उनमें न करते हुए भी बहुत कुछ करते हुए दिखने का हमें विराट अनुभव है। मामले को रबर की तरह खींच देने से अकसर ही निदान भी हो जाता है। या टेबल पर कोहनी टिका, ठुड्डी हाथ पर रखकर सोचनीय मुद्रा में बैठ जाते हैं।

यह प्रक्रिया इतनी बार दोहराई जाती है कि स्साला यह देखकर रेंसमवेयर तक पसोपेश में पड़ जाता है कि कहीं वह गलत कंप्यूटरों में तो नहीं आ फंसा! ऐसे वक्त में एकदम टॉप से नीचे की ओर एक रिपोर्ट मांगने की प्रक्रिया चलती है, बदले में नीचे से ऊपर तक ठंडी-सी प्रतिक्रिया जाती है, जी, कंप्यूटर नहीं चल रहे हैं, चलें तो बताएं कि क्या-क्या नुकसान हुआ है।

कंप्यूटर खोलते ही वायरस धमककर बोलता है—फिरौती दो! अब काम क्या करें, मतलब दिन भर करें क्या। कंप्यूटर वायरसग्रस्त हैं। इस माहौल में जो ठीक-ठाक चल रहे होते हैं, वे भी एकदम सिक्योरिटी के लिहाज से बंद कर दिए जाते हैं कि कहीं इनमें भी न घुस जाए वायरस! फिर लोग भी दफ्तर से बाहर निकल जाते हैं कि कहीं वायरस उनमें ही न घुस जाए! उनके बदले तो कोई फिरौती भी नहीं देगा।

असली समस्या यह है कि करें क्या, इसलिए सारा जोर चर्चा पर आ जाता है, वायरस विमर्श विद् समोसा, बिस्किट, कोल्डड्रिंक्स, नमकीन। फिर ग्लोबल वायरस के देशी नतीजे ये निकलते हैं कि समोसे अच्छे हैं, आगे से इसी दुकान से मंगवाए जाएं। इस प्रकार रेंसमवेयर वायरस का योगदान बतौर बढिय़ा समोसों की खोज के रूप में फलित होता है। थैंक्स रेंसमवेयर!

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