जीवनी के मानकों से इतर कुछ तथ्य

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ज्ञान चंद्र शर्मा
स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर अनेक उत्कृष्ट पुस्तकें रची गई हैं। उनमें एक अमरेन्द्र नारायण कृत ‘एकल और शक्ति’ भी है, जो अन्य कृतियों से जरा हट के है।

इसमें सरदार पटेल एक पात्र रूप में न आकर, एक कल्पित पात्र चमन भाई और उसके परिवार को केंद्र में रखते हुए, उनके माध्यम से सरदार श्री और उनके जीवनकाल से जुड़ी हुई सभी महत्वपूर्ण घटनाओं और परिस्थितियों का ब्योरा प्रस्तुत किया गया है।

चमन भाई का परिवार गुजरात राज्य के खेड़ा (आज के आणंद) जिले के बोरसद ताल्लुका में आने वाला गांव रास का रहने वाला है। यह वही गांव है जहां से सरदार पटेल का राजनीतिक जीवन प्रारंभ हुआ था। यहीं दांडी यात्रा से पूर्व उन्हें बंदी बना लिया गया था।

खेड़ा, बोरसद बारडोल सहित यह स्थल स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक मुख्य आंदोलनों का साक्षी रहा। इसे एक प्रकार से सरदार पटेल की प्रथम कार्यस्थली कहा जा सकता है। इस पश्चात उन्होंने उत्तरोत्तर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को निभाया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उन्हें एक कर्मठ और निर्भीक योद्धा के रूप में देखा जा सकता है।

इंग्लैंड से वकालत की शिक्षा प्राप्त कर आए वल्लभ भाई अपनी अच्छी-भली प्रैक्टिस छोड़कर एक बार जो आजादी की लड़ाई में कूदे तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने खेड़ा सत्याग्रह, रौलेट एक्ट विरोध, स्वदेशी, खादी, असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन, झंडा सत्याग्रह, बार डोली का किसान सत्याग्रह आदि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सरदार पटेल पर महात्मा गांधी का गहरा प्रभाव था। महात्मा गांधी के आदर्शों तथा मूल्यों का उन्होंने आजीवन पालन किया। स्वतंत्रता प्राप्त के पश्चात महात्मा गांधी की ही इच्छा को सम्मान देते हुए बहुमत अपने पक्ष में होने के बावजूद सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री का पद पंडित जवाहरलाल नेहरू के हित में त्याग दिया।

देश के गृहमंत्री के रूप में विभाजन के बाद की अव्यवस्था को उन्होंने बड़े सुचारु ढंग से संभाला। उनकी सबसे बड़ी देन देश की छह सौ के करीब छोटी-बड़ी रियासतों का उसमें विलय है। यह काम अधिकतर समझाने-बुझाने से हुआ। हैदराबाद, जूनागढ़ आदि में बल प्रयोग से भी उन्होंने परहेज नहीं किया। केवल जम्मू-कश्मीर में उनकी चलने नहीं दी गई और वही तब से एक रिसता हुआ नासूर बना हुआ है।

दुर्भाग्य से वह अधिक देर तक जीवित नहीं रहे अन्यथा देश की दशा और दिशा कुछ और होती। ‘एकता और शक्ति’ में लेखक का मुख्य उद्देश्य उसके अपने शब्दों में भारत के उस महान नेता के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित करता है जिसमें वह काफी हद तक सफल रहा है।

यह रचना उपन्यास और जीवनी के स्वीकृत मानकों से इतर सरदार पटेल के योगदान को एक ऐसे सामान्य व्यक्ति की दृष्टि से समझने का प्रयास है जो सभी आंदोलनों में उनका सहयोगी कार्यकर्ता रहा। यह उसी की विवरणिका है। रचना को तीन भागों में बांटा गया है।

पहला भाग सन् 1918 में गुजरात के खेड़ा के सत्याग्रह से प्रारंभ होकर सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ समाप्त होता है। दूसरे भाग में सन् 1947 से लेकर सन् 1952 में सरदार पटेल के निधन तक के महत्वपूर्ण घटनाचक्र का विवरण है। तीसरे भाग में लेखक वर्तमान सन् 2०16 में आकर चमन भाई तथा उनके परिवार तथा समकालीन परिस्थितियों का ब्योरा प्रस्तुत करता है।

‘एकता और शक्ति’ रचना में सरदार पटेल के जीवनवृत्त के अतिरिक्त गुजराती समाज के गठन, जीवनशैली, रहन-सहन, रीति-रिवाज, आशाओं-आकांक्षाओं की भी अच्छी झलक मिलती है। इस दृष्टि से भी पुस्तक पाठ्य है।

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