खट्टर से खुश शाह

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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा हरियाणा में नेतृत्व परिवर्तन से इनकार के बाद संभव है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के विरुद्ध असंतुष्ट गतिविधियां मंद पड़ जायें, लेकिन किसी भी सरकार के कामकाज की अंतिम जज जनता होती है। इसलिए खट्टर को चाहिए कि आलाकमान की इस क्लीन चिट से आत्ममुग्ध होने के बजाय दिनोंदिन बिगड़ती कानून व्यवस्था समेत राज्य में सिर उठाती चुनौतियों से निपटने के लिए कमर कसें।

खट्टर सरकार अपना लगभग आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है। किसी भी सरकार के कामकाज के आकलन के लिए यह पर्याप्त अवधि होनी चाहिए। बेशक मुख्यमंत्री को भी अपनी सरकार के कामकाज के आकलन का अधिकार है। भाजपा भी हरियाणा में पहली बार बनी अपनी इस सरकार के कामकाज का आकलन करेगी ही। अमित शाह द्वारा हरियाणा में नेतृत्व परिवर्तन से स्पष्ट इनकार से तो यही संदेश गया है कि भाजपा खट्टर सरकार के कामकाज से संतुष्ट है, लेकिन यह बात जनता की बाबत नहीं कही जा सकती।

यह विडंबना ही है कि गीता संदेश की यह धरती आज जघन्य अपराधों के लिए सुर्खियां बन रही हैं। निश्चय ही हरियाणा में बढ़ते अपराधों के लिए सिर्फ मौजूदा खट्टर सरकार को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन वह इसके लिए पूर्ववर्ती सरकार को ही दोषी ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी-जवाबदेही से बरी नहीं हो सकती।

जनता पूर्ववर्ती सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं रही होगी, तभी तो उसने वर्ष 2०14 के विधानसभा चुनावों में हरियाणा में पहली बार भाजपा को स्पष्ट जनादेश दिया। जाहिर है, उसमें नरेंद्र मोदी लहर की निर्णायक भूमिका रही होगी, लेकिन भाजपा ने राज्य में सुशासन और विकास के लंबे-चौड़े वादे भी किये थे। उन वादों की बाबत बातें तो बड़ी-बड़ी हुई हैं, पर अमल अभी दूर-दूर तक नजर नहीं आता।

भाजपा ने हरियाणा की पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार समेत तमाम गलत कामों की जांच, सुधार तथा दोषियों को दंड के भी वादे किये थे, लेकिन उस दिशा में भी अभी तक धरातल पर कुछ नजर नहीं आता। फेहरिस्त लंबी बन सकती है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को उदाहरण ही काफी होगा।

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने वाड्रा के भूमि सौदों में कथित अनियमितताओं को उछालते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा था, लेकिन उनकी बाबत जांच आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं किया गया है। विकास की लंबी-चौड़ी बातें भी गाय, गीता और सरस्वती सरीखे भावनात्मक मुद्दों तक ही सीमित हैं। हरियाणा को न तो जल संकट से उबारने के लिए कुछ किया गया है और न ही बिजली संकट से राहत की दिशा में कुछ।

रोडवेज समेत सरकारी कर्मचारियों का असंतोष भी अपनी जगह बरकरार है, तो जाट आरक्षण आंदोलन की चुनौती भी कुछ समय के लिए टली भर है, क्योंकि मांगी गयी मांगों को पूरा करने की दिशा में सरकार ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। खट्टर सरकार और भाजपा, दावा कर सकते हैं कि विरासत में मिली समस्याओं का समाधान दीर्घकालीन नीति-रणनीति मांगता है, इसलिए अगले चुनाव तक इंतजार करना चाहिए।

हालांकि यह अर्धसत्य ही है, क्योंकि आधे कार्यकाल में समाधान का रोडमैप तो दिख ही जाना चाहिए, लेकिन हत्या-बलात्कार सरीखे जघन्य अपराधों में उछाल पर खट्टर सरकार क्या सफाई देगी अपराध नियंत्रण की काबिलियत तो दूर, हरियाणा पुलिस अपेक्षित संवेदनशीलता तक नहीं दिखा पा रही।

रोहतक गैंप रेप की शिकार युवती का शव पुलिस ने युवक बताते हुए पोस्टमार्टम के लिए भेजा। प्रधानमंत्री की तर्ज पर, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नारा खट्टर सरकार का भी प्रिय है, लेकिन रोहतक से रेवाड़ी तक की घटनाएं बताती हैं कि बेटियां न तो बच पा रही हैं, न ही पढ़ पा रही हैं।

कहना नहीं होगा कि अगले चुनाव में आलाकमान न सही, जनता तो इन सारे सवालों का जवाब मांगेगी ही।

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