भ्रष्टाचार की गंगा बहने दो

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हमारे संवाददाता
देहरादून। जिस भ्रष्टाचार के मुद्दे के इर्द गिर्द अब तक उत्तराखण्ड की राजनीति घूमती रही है और भाजपा व कांग्रेस सत्ता की सीढि़यां चढ़ती रही है उस भ्र्र्र्रष्टाचार पर भले ही सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जीरो टालरेंस की बात करते रहे हों। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग अब महज एक औपचारिकता बनती दिख रही है। भाजपा के आला नेता व केन्द्र सरकार नहीं चाहती कि त्रिवेन्द्र रावत इस झमेले में उलझे।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने सत्ता की कमान संभालते ही अपने पहले ही विधानसभा सत्र में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने वाले लोकायुक्त विधेयक को लाकर यह संदेश दिया था कि वह अपने राज में भ्रष्टाचार नहीं होने देगें। यही नहीं त्रिवेन्द्र रावत ने एनएच-74 में हुए तीन सौ करोड़ के घोटाले के मामले में 6 पीसीएस अधिकारियों को निलम्बित कर इसकी जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति कर दी गयी।

यह अलग बात है कि केन्द्र ने दो बार के अनुरोध् के बाद भी इस मामले को सीबीआई को नहीं सौंपा लेकिन केन्द्रीय सड़क मंत्री नितिन गडकरी ने पत्र लिखकर जो कुछ कहा है वह यही बताता है कि भाजपा व केन्द्र सरकार नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगे।

नितिन गडकरी का कहना है कि इसकी सीबीआई से जांच करायी तो राज्य में सड़क निर्माण योजनाएं प्रभावित होगीं। इसका सीधा अर्थ है कि नेता व अधिकारी लूटपाट कर रहे हैं तो उन्हे करने दें। इस भ्रष्टाचार की गंगा को यूं ही बहने दें।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह द्वारा लोकायुक्त को विधान परिषद समिति को सौंपा जाना तो उनकी जीरो टालरेंस पर सवाल खड़ा करने वाला था ही लेकिन केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री गडकरी का सुझाव जो उन्होने सीएम को दिया है वह वाकई हैरान करने वाला है।

खास बात यह है कि अपने दो माह के शासन काल की उपलब्ध्यिों में जिस भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की बात का प्रचार किया जा रहा है क्या यही उनकी टालरेंस पालिसी है। अब दो माह में यह साफ हो गया है कि वह भ्रष्टाचार पर अब टालमटोल पालिसी अपनाने जा रहे है।

वैसे भी सीएम भ्रष्टाचार पर जो कर रहे थे वह सीने पर पत्थर रखकर कर रहे थे। क्योंकि इससे भाजपा नेता भी प्रभावित हो रहे थे अच्छा ही हुआ नितिन गडकरी ने उनके सीने पर रखा पत्थर हटा दिया। वैसे भी भ्रष्टाचार मिटाने पर किसी दल व नेता को लेना भी क्या है।

उत्तराखण्ड के नेता भी तो इसे केजरीवाल की तरह सत्ता की सीढि़यां चढ़ने का जरिया बनाते रहे है। लोकायुक्त लाते और उसे रद्दी की टोकरी में फैंकते रहे है। त्रिवेन्द्र सिहं अगर भ्रष्टाचार की इस गंगा में हाथ धेना नहीं चाहते है तो न धेये लेकिन इस गंगा को बहने दें।

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