बदहाली का ठीकरा किसके सिर

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रोहित कौशिक
हमारे देश में तकनीकी शिक्षा विभिन्न विसंगतियों के चलते दयनीय स्थिति में है। पिछले वर्ष से अब तक 122 निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों ने स्वैच्छिक बंदी के विकल्प को चुना है। इनमें से ज्यादातर कॉलेज महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा के हैं।

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (एआईसीटीई) के आंकड़ों के अनुसार 2०16-17 में पुणे, नागपुर, औरंगाबाद, जलगांव और कोल्हापुर के 23 इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हो चुके हैं। इसी अवधि में गुजरात के 15, तेलंगाना के 7, कर्नाटक के 11, उत्तर प्रदेश के 12, पंजाब के 6, राजस्थान के 11 और हरियाणा के 13 इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हो चुके हैं। ऐसा नहीं है कि केवल इसी साल इंजीनियरिंग कॉलेजों को छात्र नहीं मिल रहे हैं। पिछले साल भी यही हाल था।

ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेन्ट की डिग्रियों से छात्रों का मोह भंग क्यों हुआ है?

अगर कम्पीटीशन के माध्यम से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने की बात छोड़ दें तो सन् 2००० तक छात्र दक्षिण के निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में इंजीनियरिंग पढऩे जाते थे। उस समय इंजीनियरिंग में प्रवेश कराने वाले दलालों ने भारी मुनाफा कमाया। 1997 में दक्षिण की तर्ज पर ही देश के विभिन्न राज्यों में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने शुरू हुए।

सन् 2००6 से 2०1० तक देश में कुकुरमुत्तों की तरह निजी इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेन्ट कॉलेज खुले। पहले से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अगर इन निजी कॉलेजों का पनपना इसी तरह जारी रहा तो भविष्य में इन कालेजों को छात्र मिलने मुश्किल हो जाएंगे। यह आशंका सही साबित हुई। आज इन कॉलेजों को अपनी सीटें भरने के लिए ऐड़ी चोटी के जोर लगाने पड़ रहे हैं। छात्र न मिलने के कारण अनेक कॉलेज बन्द होने के कगार पर हैं।

इन कॉलेजों को छात्र न मिलने का एक बड़ा कारण जरूरत से ज्यादा कॉलेजों का पनपना तो है ही। साथ ही कुछ अन्य कारण भी हैं। अच्छी जगह से डिग्री लेने की चाहत और कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आज अभिभावक और छात्रों को इंजीनियरिंग और मैनेजमेन्ट की डिग्री एक मजाक लगने लगी है।

अधिकतर निजी कॉलेजों से ये डिग्रियां लेने के बाद छात्रों को नौकरी प्राप्त करने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। नौकरी मिल भी जाती है तो वहां भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जब छात्रों को डिग्री के अनुसार वेतन नहीं मिलता तो वे अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं। यही कारण है कि आज अभिभावकों और छात्रों का इन डिग्रियों से मोह भंग हुआ है और वे दूसरी डिग्रियों की तरफ रुख करने लगे हैं।

दरअसल निजी कॉलेजों के मालिकों को अपने संसाधनों के माध्यम से कॉलेजों का खर्चा चलाना पड़ता है। जब वे अपना पैसा लगाकर कालेज खोलते हैं तो जाहिर है कि वे उससे मुनाफा भी कमाना चाहेंगे। ऐसे कॉलेजों को सरकार की तरफ से भी कोई अनुदान नहीं मिलता। इस मामले में सरकार सारा दोष कॉलेजों के मालिकों पर डाल देती है।

क्या कारण है कि सरकार लगातार अपनी जिम्मेदारियों से बचती रहती है? अगर कॉलेजों को छात्र नहीं मिलेंगे तो वे किस प्रकार अपने संसाधन जुटा पाएंगे? सरकार अगर कॉलेजों के मालिकों को कॉलेज खोलने की अनुमति देती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कॉलेजों को छात्र भी मिलें।

दरअसल इस दौर में शिक्षा प्रदान करने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से एक व्यवसाय में तबदील हो चुकी है। इस व्यवसाय में सरकार, सम्बन्धित विश्वविद्यालय और एआईसीटीई सभी शामिल हैं। इन कॉलेजों को आल इंडिया कौंसिल फार टेक्नीकल एजुकेशन यानी एआईसीटीई नामक संस्था मान्यता देती है।

पिछले दिनों एआईसीटीई के अन्दर भ्रष्टाचार की खबरें प्रकाश में आई थीं। विडम्बना यह है कि कई बार एआईसीटीई से जुड़े कुछ लोग निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों के हितों के अनुरूप कार्य करते हैं तो कई बार इन कॉलेजों से पैसे उगाहने के लिए जानबूझ कर कॉलेजों में कमियां निकाल दी जाती हैं।
विडम्बना यह है कि कॉलेजों के मालिकों को तो सभी दोष दे देते हैं लेकिन सरकारी मशीनरी को कोई दोष नहीं देता।

इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार, प्राविधिक विश्वविद्यालय और एआईसीटीई छात्रों को केवल डिग्रियां बांटना चाहती हैं या फिर उन्हें एक सफल इंजीनियर एवं प्रबन्धक बनाना चाहती हैं? इन तीनों संस्थाओं के मौजूदा रवैये से तो यही लगता है कि हम डिग्रीधारी युवकों की एक फौज खड़ी करना चाहते हैं।

शिक्षा के मन्दिरों का बन्द होना न तो शुभ होता है और न ही समाज में सकारात्मक सन्देश देता है। इसलिए हमें पहले ही ऐसी कोशिश करनी होगी, जिससे कि ये कॉलेज बन्द होने की स्थिति में न आएं। साथ ही ये कॉलेज शिक्षा की दुकान न बनने पाएं।

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